Showing posts with label Indian Democraty. Show all posts
Showing posts with label Indian Democraty. Show all posts

Friday, February 7, 2020

गाँधी मुस्लिम और गोडसे हिन्दू होते जा रहे हैं और हम?If Gandhi ji is Muslim and Godse Hindu, what we are?


गाँधी मुस्लिम और गोडसे हिन्दू होते जा रहे हैं और हम?

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
देश की वर्तमान राजनीति जिस और जा रही है यह समूचे भारत के लिए दुखदायी है। गाँधी और गोडसे के बीच मोती होती दीवारें और गहरी होती खाइयाँ गाँधी और गोडसे के के अहिंसा और हिंसा के प्रतीक को ख़त्म करते जा रहे हैं। धार्मिक हिंसा और नफ़रत इस क़दर बढ़ गई है कि देश की दशा और दिशा की सुध ही नहीं है। विपक्ष की बिसात और कन्धों पर की जाने वाली राजनीति का अंत बर्बादी के सिवा कुछ नहीं है।
कल जिस तरह से एक बच्चे ने अपने हाथ में पिस्तौल ले कर नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में धरना प्रदर्शन क्र रहे निहत्थे छात्रों पर गोली चलाई और हवा में बन्दूक लहरा कर अपने प्रेरकों का अभिवादन किया है वह चिंता का विषय है।
यह सवाल देश के हर नागरिक को करना चाहिए। अभी दो दशक भी नहीं बीते हैं जब मुस्लिम कट्टरवाद की जड़ों तक पहुँच कर उस के स्रोतों और प्रेरकों पर प्रहार किये गए हैं। कुछ मुस्लिम नौजवानों को भी यही बताया गया था कि जब ख़ुद को बम से उड़ा कर कुछ लोगों की जान नहीं ली जाएगी इस्लाम की रक्षा नहीं होगी और न ही खुदा खुश होगा। आख़िरकार मुस्लिम तथाकथित जिहाद पूरी दुनिया में इस्लाम और मुसलमानों के लिए शर्मनाक हो गया। पिछले एक दशक से विश्व भर का मुसलमान सफाई देता फिर रहा है क्यूंकि जिहादी कट्टरता फैलते समय बहुसंख्यक मुस्लिम चुप था। चुप इस लिए था कि देश विदेश में कई जगह मुसलमानों पर अत्याचार हो रहे थे। इस लिए उन सरफिरों ने बदले के लिए हिंसा का रास्ता अपनाया। नतीजा हमारे सामने है।
जिस तरह इस्लाम हिंसा की इजाज़त नहीं देता उसी तरह सनातन धर्म और संस्कृति भी किसी तरह की हिंसा का घोर विरोधी है। जिस तरह इस्लाम के नाम पर व्यक्तिगत, राजनैतिक और व्यवसायिक लाभ के लिए कट्टरता को धर्म की रक्षा की आड़ में जिहादी विचारधारा फैलाई गई। डर का व्यापार किया गया। मारकाट की विडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल की गयी ठीक उसी तरह हिन्दू धर्म की रक्षा की आड़ में हिंदुत्व के नाम पर कट्टरता को धर्म युद्ध बता कर युवाओं को बहकाया जा रहा है।
यह मामला शरजील इमाम या रामभक्त गोपाल का नहीं है। यह तो सरकारी संरक्षण में सांप्रदायिक राजनीति के आरम्भ का मामला है। जिस तरह का वक्तव्य आज की राजीनीति में हो रहा है वो देश के युवाओं दिशाहीन कर के उन्हें अपने देश के ख़िलाफ़ खड़ा करने का काम आज की बेलगाम बयान बाज़ियाँ कर रही हैं।
देश का युवा देश के विकास और उस की ऊंचाई के बारे में सोचने के बजाये ऐसे धर्म को बचाने में लगा है जिस का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
आज का समाज देश के बहुसंख्यक के लिए एक परीक्षात्मक चुनौती है। धर्म के नाम पर बसाये गए एक भारत के एक छोटे से टुकड़े का हल सभी ने देख लिया। यही वजह है कि भारत का अपना एक संविधान तैयार हुआ जिस में उस वक़्त सभी धर्मों और वर्गों के प्रतिनिधियों ने देश को धर्म निरपेक्ष और लोकतान्त्रिक रखने का फैसला किया।
अल्पसंख्यकों के लिए भी एक ऐसी ही परीक्षात्मक चुनौती पूर्ण घड़ी आयी थी। जब उन्हें जिन्ना और आज़ाद में से किसी एक चुनना था। जिन्ना के साथ इस्लामी देश का सपना था। मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी थी। आज़ाद के साथ अल्पसंख्यक की श्रेणी थी और धर्म निरपेक्षता एवं लोकतंत्र का वातावरण। उन्हों ने अपना चुनाव कर लिया था।
आज बहुसंख्यक के लिए भी शायद चुनाव की घड़ी आ गयी है। गाँधी और गोडसे के बीच चुनाव करना है। गोडसे के साथ जिन्ना जैसा देश मिल सकता है और शायद पाकिस्तान जैसी बर्बादी भी। गाँधी के के साथ लोकतंत्र, धर्म निरपेक्षता और संवैधानिक जीवन।
रही बात कट्टरपंथी सोच और विचारधारा की तो उसे कभी भी ख़त्म किया जा सकता है।ज़ुल्म और अत्याचार के ख़िलाफ़ सत्ता, समाज या या शासन की ख़ामोशी बड़ा नुकसान करती है। धर्म के नाम पर उन्माद फैलाने वालों की संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है लेकिन उन की आवाज़ में ज़ोर इस लिए है क्यूंकि सुनने और सुन कर चुप रहने वालों की संख्या ज़्यादा है।
जब शरजील इमाम की गिरफ़्तारी हुई तो उस के नाम और धर्म से देश द्रोह जोड़ दिया गया। अब रामभक्त गोपाल के साथ भी भगवा आतंकवाद थोप दिया जायेगा। इस से इस कट्टरपंथी विचारधारा को और मज़बूती ही मिलेगी।
सोशल मीडिया के देश भक्त, धर्म रक्षक और घोर समाज सेवक, विचारक एवं क्रन्तिकारी बुधीजिवियों के टाइम पास के लिए एक टॉपिक हो गया है। इस से फर्क़ नहीं पड़ता है कि इस अनावश्यक वाद विवाद में देश का असल मुद्दा कहीं खो जाता है।



@@---Save Water, Tree and Girl Child Save the World---@@

Tuesday, January 21, 2020

नए भारत का इन्कलाब हूँ मैं I am the new revolution in India


नए भारत का इन्कलाब हूँ मैं

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
“गौर से देखो मुझे, शाहीन बाग हूँ मैं” का नारा देश के कोने कोने से गूंज रहा है। संविधान और उस के मूल्यों में विश्वास रखने वाली भारत की हर बेटी आज शाहीन बाग पर गर्व कर रही है। बादल कितने ही घने क्यूँ ना हों, एक दिन उन्हें छटना ही पड़ता है। सत्ता के जिद्दी बादल संविधान की स्याही को कुछ बरसाती मेंढकों की टर्र टर्र से मिटाने की कोशिश करना चाहते हैं लेकिन संविधान की यह सियाही किसी किताब का हिस्सा नहीं है बल्कि भारत के सीने नक्श किया हुआ ऐसा लेख है जिसे मिटाना इतना आसान नहीं है। 
अपनी नाकामी और ना क़ाबिलियत छुपाने के लिए चाहे जितने काले बादल भारत के संवैधानिक मूल्यों, लोकतान्त्रिक मान्यताओं एवं धर्म निरपेक्षता के अटूट और अखंड भारत के सपनों को घेरने की कोशिश कर लें, इन्कलाब का सूरज दिल्ली का शाहीन बाग बन कर अराजकता के पहाड़ों को पिघलायेगा और भ्रष्ट नेतृत्व से आज़ादी की प्यास बुझाएगा।
दिल्ली का शाहीन बाग भारत के इन्क़लाब के इतिहास में अमर होता जा रहा है। जब गाँधी की अहिंसा की विचारधारा की रौशनी फैल रही हो, तो अँधेरे के सौदागरों को भला यह बात कैसे अच्छी लग सकती है। गोडसे के पुजारी लगातार गाँधी विरोध में दिन रात जल रहे हैं लेकिन उन्हें हर रोज़ कुछ नए गाँधी पैदा होते नज़र आ रहे हैं। उन्हें मालूम नहीं कि गाँधी के शरीर को गोली मारी जा सकती है उन के विचारों को नहीं।
दिल्ली के शाहीन बाग के इंकलाबी जज्बे को जब पैसे के बेहूदा इलज़ाम से रोंदा नहीं जा सका तो उसे एक धर्म मात्र से जोड़ कर हिन्दू मुस्लिम का संविधान विरोधी कार्ड खेला गया। अभी इस कार्ड को गोदी मीडिया और बकैत नेताओं ने “IT Sale” की मदद से ख़ाली खोपड़ी में भरने का प्रयास भर किया था कि शाहीन बाग की औरतों और प्रदर्शनकारियों को कट्टरपंथी नज़र से देखने वालो के मुंह में ताला पड़ गया। हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई चारों लोगों ने एक साथ बैठ कर अपनी धार्मिक रस्मों का द्रश्य देश दुनिया को दिखा दिया। 
जिस से यह पता चल गया कि यह प्रदर्शन धार्मिक नहीं है और न किसी धर्म को बचाने की लड़ाई है बल्कि यह मामला देश का और उस के संविधान का है। भारतीय होने के नाते उसे बचाने की ज़िम्मेदारी भारत के सभी नागरिकों की है।

इस हिन्दू मुस्लिम कार्ड के फेल हो जाने के बाद 19 जनवरी को ऐसा कुछ हुआ कि जिस ने पूरे देश को हिला दिया। 19 जनवरी को समाजी कार्यकर्त्ता और अभिनेत्री स्वर भास्कर ने जश्ने शाहीन बाग मनाने का एलान किया था। कश्मीरी पंडितों के नाम पर राजनीति करने वाली मुद्दा मुक्त पार्टी के बकैत नेताओं ने कुछ कश्मीरी पंडितों को शाहीन बाग भेजने का प्लान बनाया जहाँ वह CAA, NRC के समर्थन में धरना देने वाले थे। उन कश्मीरी पंडितों ने कहा कि आज ही के दिन कश्मीर में हमारी बस्तियां उजाड़ी गयी थी, भला आज के दिन जश्न कैसे मनाया जा सकता है।
शाहीन बाग की मुखर, निडर, देश प्रेमी, सामाजिक सौहार्द एवं सद्भाव वाली औरतों ने अपना स्टेज उन कश्मीरी पंडितों को सौंप दिया और कहा कि आप भी अपना एहतिजाज कर लो। जिन लोगों ने आप को कश्मीर वापस दिलाने का सिर्फ़ वादा कर के आप का इस्तेमाल किया हैं उन्हें भी मालूम होना चाहिए कि हम किसी के जले पर नमक नहीं लगाते।
 हम भारतीय हैं और इस मुल्क की मिटटी ने हमें मरहम लगाना सिखाया है। शाहीन बाग की औरतों ने कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अत्याचार की निंदा की और सभी कश्मीरियों को गले से लगा लिया। इस का असर यह हुआ कि वह कश्मीरी पंडित भी शाहीन बाग की औरतों के साथ बैठ गए उन्हों कहा कि मैं इस नए कानून का समर्थन तो करता हूँ लेकिन तुम्हारे दर्द में शामिल हूँ।

आख़िर कार अंग्रेज़ों की गुलामी करने वाले दिमाग को कभी तो अक्ल आएगी और इस देश की मिटटी से प्यार करेगें। नए भारत का इन्कलाब हूँ मैं, गौर से देख मुझे, शाहीन बाग हूँ मैं।

@@---Save Water, Tree and Girl Child Save the World---@@