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Wednesday, January 8, 2020

JNU में आतंकी हमला, संघी साज़िश या चुनावी हिंसा?JNU Terror attack, conspiracy or political violence


JNU में आतंकी हमला, संघी साज़िश या चुनावी हिंसा?

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
JNU कैंपस में 5 जनवरी की रात को हुए आतंकी हमले की चरों और निंदा हो रही है। सत्ताधीश सरकार, दिल्ली पुलिस और JNU प्रशासन सवालों के घेरे में हैं। जवाब देने की बजाये उल्टा चोर कोतवाल को डांट रहा है। 30 से ज़्यादा छात्र इस आतंकी हमले में घायल हुए है साथ कुछ अध्यापकों को भी छोटें आयी हैं। JNU में हुई फीस वृधि को लेकर पिछले एक महीने से ज़्यादा दिनों से छात्र शांति पूर्ण धरना प्रदर्शन कर रहे थे। विश्वविद्यालय के कुलपति से मिल कर बात करने की भी मांग कर रहे थे लेकिन साहेब मिलने के लिए राज़ी नहीं हुए।

JNU भारत का एक ऐसा विश्वविद्यालय है जिस छात्र विदेशों में पढ़ाते हैं। देश के ब्यूरोक्रेट, प्रशासन, राजनीति, सामाजिक, न्यायिक, और आर्थिक व्यवस्थाओं में इस यूनिवर्सिटी का अतुल्य योगदान है। इस से बढ़कर सामाजिक, व्यावहारिक, संवैधानिक और लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति इस यूनिवर्सिटी ने सदैव एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भी संवैधानिक और और लोकतान्त्रिक ढांचे के साथ किसी भी तरह की छेड़ छाड़ हुई है इस शैक्षिक संस्थान ने अपनी आवाज़ बुलंद की है।
जिस तरह से इस यूनिवर्सिटी को कुतर्क, अमानवीय और अराजक राजनीति की आग में धकेल दिया गया है वह निंदनीय और शर्मनाक है। यह चिंता का विषय कैंपस प्रशासन, इस से जुड़े हुए छत्र संघ, अध्यापक संघ और यहाँ से पढ़ कर निकले हुए देश विदेश में सेवा दे रहे ओल्ड बॉयज संघ समेत सब के लिए है।
JNU पर होने वाला यह आतंकी हमला देश के किसी विश्वविद्यालय विशेष पर नहीं है। यह हमला देश के लोकतंत्र के ढांचे पर है संविधान के मूल्यों पर है। अगर आप सवाल बर्दाश्त नहीं कर सकते, अगर आप टिप्पड़ी पर धैर्य नहीं रख सकते, अगर आप प्रबंधन पर नियंत्रण नहीं रख सकते, अगर आप छात्रों के साथ तालमेल नहीं रख सकते तो आप को सत्ता त्याग देना चाहिए। प्रशासन हो, शासन या या संघ हो।
देश के लिए इस से बड़ा दुर्भाग्य पूर्ण विषय नहीं हो सकता कि अब विद्या मंदिरों पर होने वाले आतंकी हमलों की ज़िम्मेदारी लेने वाले संगठन भी देश में मौजूद हैं। उन्हें इस बात का गर्व है कि उन्हों ने हमला किया है। उस से भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि सत्ता राजनीति का इन्हें संरक्षण मिल रहा है।
सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए आतंक का सहारा लेगी, इस से बड़ा देश के साथ मज़ाक और क्या हो सकता है। जिस तरह आतंकवादी संगठन लोगों में अपना खौफ़ और डर बढ़ाने के लिए अपने जुर्मों का प्रचार प्रसार करते हैं, और कोई संगठन खड़ा हो कर उस आतंक को जस्टिफाई करते हुए सरकारी प्रशासन का मज़ाक़ उडाता है लगभग यही द्रश्य देश में पिछले कुछ वर्षों से शुरू हो गया है।
मोब लिंचिंग कि विडियो वायरल करने के बाद गोडसे ज़िंदाबाद के नारे लगा कर गाँधी का अपमान शुरू हुआ और अब विद्या के मंदिर पर हमला करने के बाद हमले कि ज़िम्मेदारी लेने कि प्रक्रिया शुरू हो गई।
एक और काम किया गया कि लोकतंत्र से तानाशाही की तरफ बढ़ते क़दम के ख़िलाफ़ कोई भी विश्वविद्यालय आवाज़ ना उठा पाए इस के रोहित वेमुला की मौत को उसी का कसूरवार ठहरा कर JNU को बदनाम करने कि साज़िश रची गई। आज JNU पर अगर बुलडोज़र चलाने का फ़ैसला भी अगर सत्ताधीश पार्टी ले लेती है तो कुछ लोग उस का भी समर्थन करने के लिए खड़े हो जायेंगे।
सवाल यह है कि इन लोकतंत्र में विश्वास रखने वालों की संख्या ज़्यादा है या मजदूर समर्थकों की तादाद।
वह लोग कहाँ हैं जिन्हों ने JNU कैंपस की मिटटी से अपने वजूद को देश विदेश में एक सम्मानजनक नाम दिया है।

Tuesday, January 7, 2020

रवीश कुमार जी! आप ने संविधान के प्रति दम तोडती उम्मीद को ताक़त दे दी।Ravish Kumar Sir, Thank You!


रवीश कुमार जी! आप ने संविधान के प्रति दम तोडती उम्मीद को ताक़त दे दी।

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में पत्रकारिता को ना सिर्फ़ संवैधानिक महत्वता हासिल होती है बल्कि उस लोकतान्त्रिक ढांचे के एक पायदान समझा जाता है। हमारे देश भारत में भी यही था पर अब नहीं है। ख़ुद लोकतंत्र के बुझते चराग के अँधेरे में उम्मीद के एक दो जुगनू ज़िन्दगी दांव पर लगाये तो हुए हैं लेकिन उस से क्या हासिल। शायद आज़ादी की तारीख़ उन मुर्दा आत्माओं में नैतिकता, बलिदान, सिधांत, ज़मीर और आत्मसम्मान की जान डालने में असफ़ल हो रही है। क्यूंकि मौत यह नहीं है कि इन्सान की आत्मा उस का शरीर छोड़ दे बल्कि मौत यह है कि इन्सान कि आत्मा में उस का ज़मीर मर जाये।
रवीश कुमार जी! इतिहास तुम्हे याद रखेगा। आने वाली नस्लें जब तुम्हें पढ़ेंगी तो उन के भी बच्चे तुम पर गर्व करेंगे जिन के बाप दादाओं ने चंद टुकड़ों की खातिर अपना ज़मीर ही नहीं बल्कि देश के लोकतंत्र को कुच्छ पूंजीपतियों के हाथों गिरवी रख दिया था।
समाज के हर वर्ग, ग़रीब, पिछले, आदिवासी, जाति, धर्म, रंग, भाषा और क्षेत्र के नाम पर शोषित, महिला, बच्चे बुज़ुर्ग, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, देश के जवान और किसानों की मूल समस्याओं को सरकार के सामने रख कर आप ने लोकतंत्र के विश्वास को जीवित रखा है। मुझे उम्मीद ही नहीं बल्कि यकीन है की उम्मीद के इस बुझते चराग को एक दिन सहारे और समर्थन की उर्जा ज़रूर मिलेगी।
प्रार्शन के इतिहास के पन्नों में मैं अभी तक कोई ऐसा नहीं पढ़ा जिस में 2 माह के बच्चे से ले कर 80 साल की बुज़ुर्ग महिलाएं 2 डिग्री तापमान की सर्दी में तिरंगा लेकर देश के संविधान के लिए सडकों पर एक महीने बैठी हों। देश की तारीख़ ने यह भी नैन देखा होगा कि तिरंगे में लिपटे लगभग 17 वर्षीय युवा को चाकू से गोद कर इस लिए मार दिया गया हो कि वो संविधान की रक्षा के नाम पर सड़क पर निकाल आया था।
रवीश कुमार जी! इन सब से बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि इन ख़बरों के लिए देश के बड़े मीडिया चैनलों को समय ही नहीं मिला और जिन्हों ने समय निकाला भी तो उन्हों ने भी लोकतंत्र का गला घोंटने का ही काम किया। मज़लूम को मुजरिम बना डाला।
रवीश कुमार जी! दिल्ली के शाहीन बाग में बैठी इन महिलाओं और बचों का पूछने सत्ता का कोई मंत्री नहीं आया और भाषणों में कहते रहे कि हम समझाने की कोशिश करेंगे। घर घर जायेंगे।
रवीश कुमार जी! इन का हाल पूछने तो वह भी नहीं आये जिन्हों ने ट्विटर, पर प्रेस कांफ्रेंस में विरोध का समर्थन किया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री से ले कर कांग्रेस के राहुल और प्रियंका तक कोई नहीं आया।
रवीश कुमार जी! आप को ज़्यादा मालूम होगा कि इन्हें किस बात का डर सता रहा है और यह डर कितना वास्तविक और स्वाभाविक है।
रवीश कुमार जी! मुझे एक बात समझ में नहीं आयी कि बहुमत में आयी सरकार, बहुमत से पारित अधिनियम, राष्ट्रपति से हस्ताक्षरित क़ानून को भी जनता के समर्थन कि आवश्यकता क्यूँ कर पड़ गई। सरकार क़ानून पर समर्थन मांग रही है।
रवीश कुमार जी! दिल की गहराइयों से आप का धन्यवाद! शाहीन बाग पहुँच कर आप ने सिर्फ़ उन महिलाओं, बच्चों, नौजवानों और बुजुर्गों का मान नहीं रखा है बल्कि आप ने संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक मूल्यों के प्रति दम तोडती उम्मीद जिंदा कर दिया है।

@@---Save Water, Tree and Girl Child Save the World---@@


Saturday, February 11, 2017

मेरा नजीब मुझे वापस दे दो!

मेरा नजीब मुझे वापस दे दो!
अब्दुल मोईद अज़हरी

भारत की पहचान भारत का संविधान और उस संबिधान के प्रति तमाम भारतीय का विश्वास है। पूर्ण विश्व में बहुसंख्यक देश होने के बावजूद आपसी सदभाव प्रेरणा दायक है। यह अकेला देश है बहुधार्मिक होने के साथ साथ विभिन्न संस्कृति और परम्पराओं कास्थान है। इस देश की अन्य विशेषताओं में से एक धार्मिक और वक्तिगत आज़ादी है। यही वजह है कि एक साथ मंदिर और शिवालों से घंटियों और आरतियों की मधुर आराधनायें सुनाई देती हैं और मस्जिद व दरगाह से अज़ान व ज़िक्र की सदायें बुलंद होती है। गुरूद्वारे में कीर्तन के साथ ईसा मसीह के चर्च में प्रेयर होता है।यही इस देश का सौंदर्य, स्वाभिमान, गर्व और गरिमा है।
यहहमारा दुर्भाग्य है किहमइस देश की एकता और अखंडता को अपनी आँखों से टूटता हुआ देख रहे हैं।इस देश को यह दशा और दिशा देने वालों ने अपने प्राणों की आहुति दी।जन,जान, माल और मर्यादा का बलिदान दिया। सुख, सुकून, मोह और माया को त्याग दिया ताकि ऐसे देश के सपने को साकार कर सकें जिस में सिक्षा, सुरक्षा, श्रधाऔर समानता की नदियाँ तमाम हिंदुस्तानिओं पर अपनी प्रेम और कोमलता को न्योछावर करें।आर्थिक, सामाजिक, न्यायिक, धार्मिक और राजनैतिक स्तर में ईमानदारी की बढ़ोतरी हो। किसी भी भारतीय को उस की जाति, धर्म या समुदाय के नाम पर आहत न किया जाये। धनवान गरीबों के साथ अत्याचार और दुर्व्यवहार न कर सकें।
अनेकता में एकता के लिए उदाहरण दिए जाने वाले देश में जिस तरह से सामाजिक, न्यायिक, धार्मिक और राजनैतिक स्तर गिरा है वो निंदनीय और गहन विचार का विषय है। न्यायिक स्तर में आयी भारी गिरावट ने देश के उन वीरों की आत्माओं को नस्तर लगाने का काम किया है जिन्हों ने देश की खातिर अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। न्याय भी अब वयक्ति देख कर मिलने लगा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि न्याय को खरीदने की परंपरागत शुरुआत हो गई है। ऐसे में व्यक्ति विशेष और खास समुदाय और समूहों की जेब में या कुर्सियों में दब कर रह गया है। ऐसे में सामाजिक मूल्यों के ऊपर कर्तव्य का भार आ जाता है लेकिन राजनीति छल और कुनितिओं के चलते उस में संदेह और दुर्व्यवहार की भावनाएं उत्पन्न होने लगीं। धार्मिक गुरुओं ने भी अपनी गुणवत्ता को अपने अपने धर्माश्रमों, पूजा स्थानों और इबादत गाहों तक सिमित कर लिया।
आज सब से बड़ा सवाल और सुरक्षा का है। इस लोकतंत्र देश का हर नागरिक अपने देश के मुखिया से कम से कम इतनी तो आशा रख सकता है कि इस देश कोविश्वमें शिखर पर पहुँचाने के लिए सामूहिक प्रयास करे जिस के लिए सिक्षा और हुनर के अवसर मिलते रहेंगे। दूसरी सब से बड़ी आशा रोटीकपड़ा और मकान के बाद यह होती है कि हर नागरिक की सुरक्षा को विश्वसनीय बनाया जाये।
पिछले दो वर्षों में विशेष कर और इक्कीसवीं शताब्दी में आम तौर पर इन तमाम मूल्यों का न सिर्फ हनन हो रहा है बल्कि ख़ुदउनके साथ अत्याचार और दुर्व्यवहार हो रहा है। तो देश का हल क्या होगा यह कहना कठिन है। देशका मन जाना विश्व विद्यालय जवाहर लाल नेहरु विश्व विद्यालय ने अपने इतिहास के पुराने पन्नों में ऐसे दिन नहीं देखे होंगे जैसे हालत उस ने 2016 में देखे हैं। हैदराबाद बाद के एक विश्व विद्यालय के एक होनहार छात्र रोहित वेमुला के साथ जो हुआ इतिहास के पन्नों में लाल सियाही से लिखा जायेगा। यह एक रोहित का मर्डर नहीं था बल्कि शिक्षा का गला घोंटा गया था। या फिर यह एक संकेत था कि अगर किसी ने भी देश के संविधान के प्रति विश्वास दिखाकर वर्तमान भ्रष्ट राजनीती के विरुद्ध जाने की कोशिश करेगा उसे रोहित वेमुला बना दिया जायेगा। यह देश के नागरिक के साथ नहीं बल्कि देश के साथ मज़ाक किया गया था।
दिन को 12:00 बजे विश्व विद्यालय के छात्रावास से एक विद्यार्थी को किडनैप कर लिया जाता है और शासन एवं प्रशासन दोनों ही अपनी अपनी कुर्सिओं पर बैठ कर दुसरे नजीब की तयारी कर रहे हैं। यह दोनों ही हादसे सिर्फ और सिर्फ उदाहरण के लिए हैं कि कोई भी भ्रष्ट नीतियों के विरुद्ध जाने की कोशिश न करे। ऐसे सैकड़ों हादसे रोज़ हो रहे हैं लेकिन उस पर कोई भी कान धरने को तैयार नहीं। एक माँ अपने बच्चे की तलाश में महीनों छात्रावास का चक्कर लगाती है लेकिन उसे जवाब आंसू, धक्के, गलियां और दरबारों के चक्कर के सिवा कुछ न मिला।पूरा छात्रावास भय और निराशा के अँधेरे में डूब गया लेकिन देश धुरंधर अपने महलों की चकाचौंध से नीचे आने को तैयार नहीं। देश के मौलिक अधिकारों का चीर हरण होता रहे अपना सिक्का भ्रष्टाचार के बाज़ार में चलता और छनकता रहे।
जे.एन.यू. के छात्रों को लगा कि अगर हम देश के संविधान के लिए खड़े न हो सके और न्यायके लिए आवाज़ न उठा सके तो फिर शिक्षा का क्या फायदा। विद्यार्थिओं को सब से पहले देश और देश के संविधान की शिक्षा दी जाती है। उस प्रति समर्पित रहना और और उसकी सुरक्षा को विश्वसनीय बनाना गुरुदाक्षिना में शामिल है। ऐसे में हर विद्यार्थी का कर्तव्य है कि वहअन्याय के विरुद्ध शशक्त आवाज़ उठाये और शिक्षा के प्रति हो रहे निरंतर अत्याचार को रोके। छात्रों का अपने अधिकारों के लिए धरना देना अपने आप में ही चर्चा का विषय है कि ऐसी स्थिति क्यूँ आई कि विद्यार्थिओं को धरना देने की ज़रूरत पड़ गयी। वर्तमान स्थिति यह है किबिना धरना दिया और चीखे चिल्लाये और लाठी डंडा खाए न्याय मिलना मुश्किल ही नहीं न मुमकिन होता जा रहा है। जब छात्र भूक हड़ताल पर बैठने को मजबूर हो जाएँ तो मौक़ा की नजाकत का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं। पिछले कई दिनों से जे.एन.यू. संगठन के साथ छात्र भूक हड़ताल कर रहे हैं.
उन में से शायद किसी का भी नजीब से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं होगा। अलग प्रदेश के भी लोग हैं। लेकिन फिर भी वह खाना पानी त्याग दे कर मुखिययों को अपनी ओर आकर्षित कर के न्याय मांग रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि यह भूक हड़ताल एक आन्दोलन बन जाये और फिर एक ऐसी लहर उठे जो अपनी गति हर धुरंधरों को बहा ले जाये।
सवाल देश की जनता से है। सभी छात्रों से है। शिक्षकों और शिक्षा से जुड़े सभी महानुभाओं से है। एक आम आदमी से लेकर देश के मुखिया से है। महीनों से रो रही माँ का सवाल देश के हर नागरिक को रोटी कपड़ाऔर मकान के साथ रक्षा और सुरक्षा देने वाले ज़िम्मेदार से है। नजीब कहाँ है ?

Abdul Moid Azhari (Amethi) E-mail: abdulmoid07@gmail.com, Contact: 9582859385