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Monday, January 20, 2020

भारत का नया इन्कलाब, बाग़ी आग शाहीन बाग़ The News Revolution in India, Shaheen Bagh


भारत का नया इन्कलाब, बाग़ी आग शाहीन बाग़


[अब्दुल मोईद अज़हरी]
NRC, CAA और NPR के विरुद्ध धरना प्रदर्शन की बढ़ती सीमा और क्षेत्र अवधि विश्व के नामी, चर्चित, एतिहासिक और इतिहास के पन्नों पर अमर आंदोलनों में से एक दिल्ली का शाहीन बाग होता जा रहा है। महिला द्वारा संचालित शांति प्रदर्शन “बागी आग शाहीन बाग” इतने लम्बे दिनों तक चलने वाला एकलौता और एकमात्र इन्किलाबी आन्दोलन बनता जा रहा है। 2 डिग्री की ठंडी और बारिश भी इन महिलाओं का हौसला ना तोड़ सकी और न ही  500 रुपये की बिकाऊ औरतें कहने का घटिया इलज़ाम उन के इरादे नहीं तोड़ सका। इसी लिए देश के किसी भी कोने में महिलाओं द्वारा शुरू किये गए शाहीन बाग के समर्थन में प्रदर्शन को शाहीन बाग का नाम दिया जाने लगा।

इस प्रदर्शन में हर वर्ग के लोगों ने अपनी प्रतिष्ठा और प्रतिभा का प्रयोग किया। 2 माह का बच्चा इस ठिठुरती ठण्ड में आने वाले दिनों के लिए साक्ष्य बना तो 4 साल कि बच्चियों ने आज़ादी के नारे लगा कर भारत के भविष्य का एलान कर दिया। अंग्रेजों को भारत से भागते देखने वाली आँखों ने भी इस आन्दोलन को साहस दिया। दिल्ली की दादियों ने 80-90 वर्ष की आयु में घर में बैठ कर बेटों और बहुओं की सेवा पाने की बजाये देश को एक नई क्रांति देने के लिए सड़कों का रुख किया और सारी रात सड़क पर ही बैठ कर सरकार को उस की ग़लती चेताने का फैसला किया।
यह धरना इस लिए भी असाधारण है क्यूंकि इस शांति पूर्ण धरने को रोकने के लिए ऐसे ऐसे प्रयास किये गए जिस की उम्मीद कभी भी किसी सभ्य समाज या व्यक्ति से नहीं जा सकती है। इस धरने में बैठने वाली लड़कियों और औरतों में लॉ, साइंस, इकॉनमी, पोलिटिकल साइंस, मैथ और UPSC की तैयारी करने वाली देश बेटियां हैं। इन में से कुछ तो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की लॉयर हैं। अब ऐसे लोगों के बारे में घटिया मानसिकता के लोगों ने यह कह दिया कि उन्हें CAA का फुल फॉर्म भी नहीं पता आख़िर कार ऐसा हुआ कि ख़ुद गृह मंत्री इस मामले में फिसल गए।
बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। चरित्र और मानसिकता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस प्रदर्शन में शामिल होने वाली औरतों में ओखला के बड़े बड़े बिल्डर्स और व्यवसाइयों के घर की महिलाएं हैं जो ख़ुद सड़क पर धरना में हैं और अपने बच्चों को भी साथ में रखती हैं। इन के बारे में यह कहा जाये कि वह 500 से 700 रुपये लेती हैं। भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने तो घटियापन की सारी हदें पार कर दीं और इन प्रदर्शनकारियों को “बिकाऊ औरतें शाहीन बाग की” कह डाला। दुर्भाग्यवश देश के मीडिया चैनल जो पत्रकारिता के माथे पर दलाली का एक दाग है उस ने ट्विटर पर इस नाम का ट्रेंड चला दिया। एक तरफ देश के प्रधान मंत्री देश की बेटियों को पढ़ाने और बचाने की बात कर रहे हैं दूसरी तरफ बीजेपी के ही नेता और एक मीडिया चैनल सर ए आम मोदी की इस स्कीम की बैंड बजा रहे हैं।
शाहीन बाग ने अपने शांति पूर्ण प्रदर्शन के अलावा धैर्य, सद्भाव और सामाजिक सौहार्द का जो उदहारण प्रस्तुत किया है वह अतुल्य और सराहनीय है। शाहीन बाग रोज़ एक नया रंग लेता हुआ नज़र आ रहा है।

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Friday, January 17, 2020

“मुल्ला” के इस्लाम में फंसा मुसलमानों का भविष्य Muslims Future in the hands of merchant clergy


“मुल्ला” के इस्लाम में फंसा मुसलमानों का भविष्य

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
अल्लाह और मुल्ला के बीच सही इस्लाम की परख की लड़ाई ने मुसलमानों को कई हिस्सों में बाँट दिया। यहाँ उन मुल्ला लोगों की बात हो रही है जिन का ज़िक्र अल्लामा इक़बाल ने अपने कई शेरों में किया है जैसे कि “मुल्ला की अजां और मुजाहिद की अजां और”। इस के अलावा यहाँ उन मोलवियों, मुफ्तियों, धर्म प्रचारकों और विचारकों की बात हो रही है जिन्हों ने सियासत के बाज़ार में इमान की सौदे बाज़ी की है, जिन्हों ने वर्तमान राजनीति में क़दम रखने का नेक और पुण्य का काम तो किया लेकिन अपने धार्मिक सिधान्तों, उसूलों, मूल्यों और नैतिकताओं की मौलिक पवित्रता से राजनीति के दामन में लगी स्वार्थ, ईर्ष्या, नफ़रत, दमन, अज्ञानता, भिन्नता, भेदभाव, भ्रष्टाचार और अराजकता की गंदगी को साफ़ कर के देश को मानवता और संविधान वादी बनाने की कोशिश करने और उस अखंडता, एकता और धर्म निरपेक्षता को बचाने में अपना सहयोग और योगदान देने की जगह वर्तमान की गन्दी राजनीति को अपने दामन व दस्तार में समेट कर इन्हों ने हमारे पूर्वजों को अपमानित करने का काम किया है।
धर्म के थोक विक्रेता शाह बानो केस से लेकर अब तक हर मोड़ पर अपने ही समुदाय को नाकाम होने के अनेकों मौके देते आये हैं। हालाँकि उस केस के बाद से कांग्रेस की उलटी गिनती शुरू हो गयी और आज विपक्ष का रोल निभाने के लायक़ भी बची नज़र नहीं आ रही है। लेकिन कांग्रेस को अभी भी थोक विक्रेता ही चाहिए। हर समुदाय से वो व्होल सेलर तलाश करते हैं। उन्हीं का पेट भरते हैं और आम आदमी को झूटे वादे और कभी ना पूरी होने वाली उम्मीद पर छोड़ देते हैं।
हालाँकि बीजेपी ने इस क्रम को तोड़ने की कोशिश की है लेकिन उस के पास मुलिम राष्ट्रीय मंच के नाम पर आरएसएस संचालित एक ऐसा संगठन है जो खुले तौर पर मुसलमानों को अपने और अपनी नीतियों के सामने खड़ा कर देते हैं।
आज जब कि पूरा देश NRC, CAA और NPR को लेकर सड़कों पर है। कोई भी थोक विक्रेता धरना प्रदर्शन के आस पास नज़र नहीं आ रहा है क्यूंकि इस आन्दोलन ने नागरिकता संशोधन क़ानून के साथ साथ तथाकथित मुस्लिम प्रतिनिधित्व से भी इनकार कर दिया है। आज देश के कोने कोने में हो रहे प्रदर्शन में इन की उपस्थिति को लगभग प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस का फ़ायदा या नुक़सान तो बाद में समझ में आएगा लेकिन एक नए नेतृत्व की शुरुआत हो चुकी है।
हैदराबाद में 4 जून को होने वाले प्रदर्शन में आंध्र प्रदेश और तेंलांगना की सैकड़ों तंजीमें थीं, लाखों की भीड़ थी, शहर कि गलियां इंसानी समंदर से भरी पड़ी थीं उस भीड़ में अगर कोई नहीं था तो आल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन और उस के नेता प्रमुख। जिस तरह से देश का सेक्युलर भारतीय आरएसएस और उस से समर्थित बीजेपी की धर्म पर आधारित राजनीति को नकारता है ठीक उसी तरह किसी और पार्टी या व्यक्ति की धार्मिक आधार की राजनीति को ना पसंद किया जा रहा है।
नए नेतृत्व के तलाश और चयन में थोडा वक़्त तो लगेगा लेकिन इस से देश और विशेष कर मुसलमानों का भविष्य उज्वल होगा, देश से नफरतें घटेंगी और सद्भाव का फिर से प्रचार प्रसार होगा। इस वक़्त देश भर में इस मोलवीवाद के विरुद्ध विचारों और विमर्शों की गंभीर लड़ाई इंडियन मुस्लिम अवेयरनेस मूवमेंट लड़ रहा है। जिस के सकारात्मक द्रश्य देखने को मिल रहे हैं। यह संगठन लेखकों, शायरों, पत्रकारों, राजनैतिक विश्लेषकों और विचारकों के साथ साथ नई पीढ़ी के युवाओं को मिला कर बनाया गया है।
यह लेख उन की गतिविधियों, तर्कों और विचारों पर आधारित है।

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Wednesday, January 8, 2020

JNU में आतंकी हमला, संघी साज़िश या चुनावी हिंसा?JNU Terror attack, conspiracy or political violence


JNU में आतंकी हमला, संघी साज़िश या चुनावी हिंसा?

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
JNU कैंपस में 5 जनवरी की रात को हुए आतंकी हमले की चरों और निंदा हो रही है। सत्ताधीश सरकार, दिल्ली पुलिस और JNU प्रशासन सवालों के घेरे में हैं। जवाब देने की बजाये उल्टा चोर कोतवाल को डांट रहा है। 30 से ज़्यादा छात्र इस आतंकी हमले में घायल हुए है साथ कुछ अध्यापकों को भी छोटें आयी हैं। JNU में हुई फीस वृधि को लेकर पिछले एक महीने से ज़्यादा दिनों से छात्र शांति पूर्ण धरना प्रदर्शन कर रहे थे। विश्वविद्यालय के कुलपति से मिल कर बात करने की भी मांग कर रहे थे लेकिन साहेब मिलने के लिए राज़ी नहीं हुए।

JNU भारत का एक ऐसा विश्वविद्यालय है जिस छात्र विदेशों में पढ़ाते हैं। देश के ब्यूरोक्रेट, प्रशासन, राजनीति, सामाजिक, न्यायिक, और आर्थिक व्यवस्थाओं में इस यूनिवर्सिटी का अतुल्य योगदान है। इस से बढ़कर सामाजिक, व्यावहारिक, संवैधानिक और लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति इस यूनिवर्सिटी ने सदैव एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भी संवैधानिक और और लोकतान्त्रिक ढांचे के साथ किसी भी तरह की छेड़ छाड़ हुई है इस शैक्षिक संस्थान ने अपनी आवाज़ बुलंद की है।
जिस तरह से इस यूनिवर्सिटी को कुतर्क, अमानवीय और अराजक राजनीति की आग में धकेल दिया गया है वह निंदनीय और शर्मनाक है। यह चिंता का विषय कैंपस प्रशासन, इस से जुड़े हुए छत्र संघ, अध्यापक संघ और यहाँ से पढ़ कर निकले हुए देश विदेश में सेवा दे रहे ओल्ड बॉयज संघ समेत सब के लिए है।
JNU पर होने वाला यह आतंकी हमला देश के किसी विश्वविद्यालय विशेष पर नहीं है। यह हमला देश के लोकतंत्र के ढांचे पर है संविधान के मूल्यों पर है। अगर आप सवाल बर्दाश्त नहीं कर सकते, अगर आप टिप्पड़ी पर धैर्य नहीं रख सकते, अगर आप प्रबंधन पर नियंत्रण नहीं रख सकते, अगर आप छात्रों के साथ तालमेल नहीं रख सकते तो आप को सत्ता त्याग देना चाहिए। प्रशासन हो, शासन या या संघ हो।
देश के लिए इस से बड़ा दुर्भाग्य पूर्ण विषय नहीं हो सकता कि अब विद्या मंदिरों पर होने वाले आतंकी हमलों की ज़िम्मेदारी लेने वाले संगठन भी देश में मौजूद हैं। उन्हें इस बात का गर्व है कि उन्हों ने हमला किया है। उस से भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि सत्ता राजनीति का इन्हें संरक्षण मिल रहा है।
सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए आतंक का सहारा लेगी, इस से बड़ा देश के साथ मज़ाक और क्या हो सकता है। जिस तरह आतंकवादी संगठन लोगों में अपना खौफ़ और डर बढ़ाने के लिए अपने जुर्मों का प्रचार प्रसार करते हैं, और कोई संगठन खड़ा हो कर उस आतंक को जस्टिफाई करते हुए सरकारी प्रशासन का मज़ाक़ उडाता है लगभग यही द्रश्य देश में पिछले कुछ वर्षों से शुरू हो गया है।
मोब लिंचिंग कि विडियो वायरल करने के बाद गोडसे ज़िंदाबाद के नारे लगा कर गाँधी का अपमान शुरू हुआ और अब विद्या के मंदिर पर हमला करने के बाद हमले कि ज़िम्मेदारी लेने कि प्रक्रिया शुरू हो गई।
एक और काम किया गया कि लोकतंत्र से तानाशाही की तरफ बढ़ते क़दम के ख़िलाफ़ कोई भी विश्वविद्यालय आवाज़ ना उठा पाए इस के रोहित वेमुला की मौत को उसी का कसूरवार ठहरा कर JNU को बदनाम करने कि साज़िश रची गई। आज JNU पर अगर बुलडोज़र चलाने का फ़ैसला भी अगर सत्ताधीश पार्टी ले लेती है तो कुछ लोग उस का भी समर्थन करने के लिए खड़े हो जायेंगे।
सवाल यह है कि इन लोकतंत्र में विश्वास रखने वालों की संख्या ज़्यादा है या मजदूर समर्थकों की तादाद।
वह लोग कहाँ हैं जिन्हों ने JNU कैंपस की मिटटी से अपने वजूद को देश विदेश में एक सम्मानजनक नाम दिया है।

Tuesday, January 7, 2020

रवीश कुमार जी! आप ने संविधान के प्रति दम तोडती उम्मीद को ताक़त दे दी।Ravish Kumar Sir, Thank You!


रवीश कुमार जी! आप ने संविधान के प्रति दम तोडती उम्मीद को ताक़त दे दी।

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में पत्रकारिता को ना सिर्फ़ संवैधानिक महत्वता हासिल होती है बल्कि उस लोकतान्त्रिक ढांचे के एक पायदान समझा जाता है। हमारे देश भारत में भी यही था पर अब नहीं है। ख़ुद लोकतंत्र के बुझते चराग के अँधेरे में उम्मीद के एक दो जुगनू ज़िन्दगी दांव पर लगाये तो हुए हैं लेकिन उस से क्या हासिल। शायद आज़ादी की तारीख़ उन मुर्दा आत्माओं में नैतिकता, बलिदान, सिधांत, ज़मीर और आत्मसम्मान की जान डालने में असफ़ल हो रही है। क्यूंकि मौत यह नहीं है कि इन्सान की आत्मा उस का शरीर छोड़ दे बल्कि मौत यह है कि इन्सान कि आत्मा में उस का ज़मीर मर जाये।
रवीश कुमार जी! इतिहास तुम्हे याद रखेगा। आने वाली नस्लें जब तुम्हें पढ़ेंगी तो उन के भी बच्चे तुम पर गर्व करेंगे जिन के बाप दादाओं ने चंद टुकड़ों की खातिर अपना ज़मीर ही नहीं बल्कि देश के लोकतंत्र को कुच्छ पूंजीपतियों के हाथों गिरवी रख दिया था।
समाज के हर वर्ग, ग़रीब, पिछले, आदिवासी, जाति, धर्म, रंग, भाषा और क्षेत्र के नाम पर शोषित, महिला, बच्चे बुज़ुर्ग, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, देश के जवान और किसानों की मूल समस्याओं को सरकार के सामने रख कर आप ने लोकतंत्र के विश्वास को जीवित रखा है। मुझे उम्मीद ही नहीं बल्कि यकीन है की उम्मीद के इस बुझते चराग को एक दिन सहारे और समर्थन की उर्जा ज़रूर मिलेगी।
प्रार्शन के इतिहास के पन्नों में मैं अभी तक कोई ऐसा नहीं पढ़ा जिस में 2 माह के बच्चे से ले कर 80 साल की बुज़ुर्ग महिलाएं 2 डिग्री तापमान की सर्दी में तिरंगा लेकर देश के संविधान के लिए सडकों पर एक महीने बैठी हों। देश की तारीख़ ने यह भी नैन देखा होगा कि तिरंगे में लिपटे लगभग 17 वर्षीय युवा को चाकू से गोद कर इस लिए मार दिया गया हो कि वो संविधान की रक्षा के नाम पर सड़क पर निकाल आया था।
रवीश कुमार जी! इन सब से बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि इन ख़बरों के लिए देश के बड़े मीडिया चैनलों को समय ही नहीं मिला और जिन्हों ने समय निकाला भी तो उन्हों ने भी लोकतंत्र का गला घोंटने का ही काम किया। मज़लूम को मुजरिम बना डाला।
रवीश कुमार जी! दिल्ली के शाहीन बाग में बैठी इन महिलाओं और बचों का पूछने सत्ता का कोई मंत्री नहीं आया और भाषणों में कहते रहे कि हम समझाने की कोशिश करेंगे। घर घर जायेंगे।
रवीश कुमार जी! इन का हाल पूछने तो वह भी नहीं आये जिन्हों ने ट्विटर, पर प्रेस कांफ्रेंस में विरोध का समर्थन किया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री से ले कर कांग्रेस के राहुल और प्रियंका तक कोई नहीं आया।
रवीश कुमार जी! आप को ज़्यादा मालूम होगा कि इन्हें किस बात का डर सता रहा है और यह डर कितना वास्तविक और स्वाभाविक है।
रवीश कुमार जी! मुझे एक बात समझ में नहीं आयी कि बहुमत में आयी सरकार, बहुमत से पारित अधिनियम, राष्ट्रपति से हस्ताक्षरित क़ानून को भी जनता के समर्थन कि आवश्यकता क्यूँ कर पड़ गई। सरकार क़ानून पर समर्थन मांग रही है।
रवीश कुमार जी! दिल की गहराइयों से आप का धन्यवाद! शाहीन बाग पहुँच कर आप ने सिर्फ़ उन महिलाओं, बच्चों, नौजवानों और बुजुर्गों का मान नहीं रखा है बल्कि आप ने संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक मूल्यों के प्रति दम तोडती उम्मीद जिंदा कर दिया है।

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Monday, January 6, 2020

JNU पर हुए अटैक को आतंकी हमला क्यूँ ना कहा जाये? Is it Not a terror attack?


JNU पर हुए अटैक को आतंकी हमला क्यूँ ना कहा जाये?

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
जिस तरह से JNU, जामिया, अलीगढ़, बनारस जैसे विश्वविद्यालय संघी आतंकियों के निशाने पर हैं इस ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि संविधान बदलना इतना आसान नहीं है। आज लगभग एक माह से पूरा देश NRC, CAA, और NPR को लेकर विरोध की आग में जल रहा है। देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, पर्यावरण मंत्री अभी तक यह तय नहीं कर पाए हैं उन्हें करना क्या है। हठ धर्मी इतनी बढ़ गई है कि देश को जला सकते हैं लेकिन अपने काले फ़ैसले में एक इंच भी बदलाव नहीं कर सकते।

यूपी में जिस तरह घर घर घुस कर लोगों को मारा गया, उन्हें लूटा गया और ख़ामोश करने का हिटलर तरीका अपनाया गया उस ने देश के सामने आज़ादी के द्रश्य रख दिए जब भारत के आज़ादी के क्रांतिकारियों को घर में घुस घुस कर मारा और लूटा जा रहा था। कल के गोरे अग्रेज़ ना कल भारत की आज़ादी रोक पाए थे और ना आज के काले अंग्रेज़ आज संविधान के साथ खिलवाड़ कर पाएंगे।
आये दिन सौहार्द और सद्भाव विरोधी फैसलों से देश का इम्तिहान लिया जा रहा था। धर्म, जाति, रंग, भाषा और क्षेत्र के नाम पर बाँट कर राजनीति का भरसक प्रयास किया गया। अंधभक्त गुंडों की टोली भी बनायीं गई। लव जिहाद, मोब लिंचिंग, घर वापसी, तीन तलाक़, 370, राम मंदिर जैसे मुद्दों के साथ भारतीय फ़ौज को भी राजनीति का शिकार बनाया गया। पुलवामा, उरी फर्जिकल स्ट्राइक में जनता की आँखों पर इमोशन की काली पट्टी बांध कर देश के जवानों को अपमानित और पूंजी पतियों के क़र्ज़ माफ़ कर के, उन्हें बड़े बड़े लोन दे कर विदेश भेजने में मदद कर के किसानों को आत्म हत्या पर मजबूर करने जैसे घ्रणात्मक कुकर्म किये गए। आर्थिक मंदी, बेरोज़गारी, बलात्कार और भ्रस्टाचार जैसे तूफ़ान में देश को धकेल दिया गया और सवालों पर पाबन्दी लगा दी गई। इसी लिए सवाल करने वाले को देश द्रोही बता कर शिक्षण संस्थानों पर संघी शासक बिठा दिया गया। अतः एक नाकामी छुपाने के लिए दूसरा बवाल खड़ा होता रहा।
आज NRC, CAA और NPR के ख़िलाफ़ पूरा देश खड़ा हो गया। पहले तो ख़ुद भ्रम फैलाया गया। देश के प्रधानमत्री और गृह मंत्री ख़ुद इस भ्रम को फैला रहे हैं। संसद में कुछ कह रहे हैं सड़क पर कुछ कह रहे हैं। संघी प्रचारक कभी इसे मुसलमानों के ख़िलाफ़ बता कर मुर्ख अंधभक्तों को बहला रहे हैं और कभी इसे दलित विरोधी बता ब्राह्मणवाद के वर्चस्व के नाम पर उच्च वर्ग को शांत किया जा रहा था। इस की वजह यह है कि दलित ने प्रताड़ना को सहन करना बंद कर दिया था और पढ़ लिख कर बराबर बैठने लगा था।
अब जब कि प्रदर्शन में हिन्दू मुस्लिम विवाद नहीं हो पाया और यह शांति पूर्ण प्रदर्शन विश्व व्यापी हो गया तो असल गुंडा गर्दी सामने आ गई। जिस तरह से JNU कैंपस में कुछ साल पहले नक़ाब पहन कर संघी गुंडों ने देश विरोधी नारे लगा कर JNU को बदनाम करने की कोशिश की थी वही काम कल फिर किया गया।
जामिया और JNU से उठी इन्किलाब की इस आवाज़ को देश की लगभग सभी राज्यों के विश्वविध्यालयों का समर्थन मिला और साथ ही विदेशी विश्वविद्यालयों ने भी आवाज़ में आवाज़ मिलाई। इसी लिए पहले जामिया में घुस कर वहां के छात्रों को आतंकित करने की कोशिश की गई लेकिन लेकिन अफसोस कि उस ने पूरे देश को जगा दिया। अब फिर से JNU छात्रों को आतंकित करने की कोशिश हुई है जिस ने यह स्पष्ट कर दिया कि गोडसे की गोली से गाँधी का शरीर तो मर सकता है लेकिन विचार उस शरीर से आज़ाद होकर हर गली कूचे में हर रोज़ हज़ारों गाँधी विचारक को जनम देते रहते रहते हैं।

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Friday, January 3, 2020

आखिर बीजेपी मोदी जी से ख़ुश क्यूँ नहीं है?Why BJP or RSS not haapy with Modi?


आखिर बीजेपी मोदी जी से ख़ुश क्यूँ नहीं है?

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी, जिन के मन की बात और वतन की बात के प्रोग्रामों में किसी भी तरह के सांप्रदायिक वक्तव्य, भेदभाव की भावना या अलगाववाद के विचार और प्रचार को निराधार किया जाता है। देश में शांति व्यवस्था बनाये रखने और किसी भी नागरिक के साथ अनैतिक व्यवहार का बर्ताव न किये जाने की वकालत भी वो करते हैं और उस का आदेश और निर्देश भी देते हैं।

लेकिन बीजेपी शासित राज्यों कि सरकारें, उन के मंत्री और पुलिस प्रशासन देश के प्रधानमंत्री की किसी भी बात को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं। NRC, CAA और NPR को लेकर देश भर में शांति प्रदर्शन हुए कहीं से भी पुलिसिया दमन और प्रशासनिक बर्बरता की ख़बरें इतनी नहीं आयी हैं जितनी कि बीजेपी शासित राज्यों से आ रही हैं। दंगाई भी इस मामले में माननीय प्रधानमंत्री जी को धोका और चकमा दे गए। जब प्रधानमंत्री ने दंगाइयों को कपडे से पहचानने की सलाह दी तो कमबख्तों ने वही कपड़े और ड्रेस ख़रीदने शुरू कर दिए। मानो ऐसा को कि मोदी ने कहा हो कि दंगा करना हो तो इस ड्रेस या इस ख़ास कपडे को पहन कर करना।
 अकेले बंगाल के एक दुकानदार के बयान के मुताबिक उस के यहाँ का वो ख़ास लिबास जिस की तरफ़ प्रधानमंत्री जी ने इशारा दिया था एक हफ्ते के अन्दर इतना बिका जितना कि साल भर में नहीं बिका था। हैरानी की बात यह है कि ख़रीदारों में बड़ी तादाद बीजेपी सदस्यों की थी।


राम रहीम के केस में कोर्ट ने आदेश दिया था कि बाबा के समर्थकों द्वारा देश की जितनी संपत्ति का नुकसान हुआ है उस का उसे राम रहीम की जायदाद से वसूला जायेगा। अब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने सोचा अब कोर्ट कचेहरी की क्या ज़रूरत है यूपी में हमारी सरकार है इसलिए उन्हों ने कहा की इस का बदला लिया जायेगा। यही नहीं बदला जिस से चाहेंगे उस से ले लेंगे। राह चले क्सिसी को भी पकड़ लिया। मारा पीटा जेल किया और नोटिस भी भेज दी।
हद तो यह है कुछ मृतकों के नाम भी नोटिस भेज दी है। इस से पहले भी बीजेपी के कुछ धुरंधर मुस्लिम महिलाओं को क़ब्र निकाल कर उन के साथ दुष्कर्म करने कि मंशा जाता चुके हैं इस लिए योगी जी ने भी नोटिस कब्रिस्तान को भेज दिया।
यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कहते थे कि पुलिस उन की सुनती ही नहीं यहाँ अभी योगी जी का बदला वाला बयान टीवी पर चला ही था कि यूपी में कारगिल युद्ध हो गया।
आन की आन में यूपी के दसियों जिलों में ऐसी गोलियां चलीं मानों अब देश का बॉर्डर कश्मीर नहीं यूपी हो। 20 के क़रीब लोगों को मार दिया गया। प्रदर्शन करने वालों कि ग़लती यह थी वह संविधान बचाने के लिए शांतपूर्ण प्रदर्शन करने निकले थे। उन्हें लग रहा था कि अभी देश का लोकतंत्र बचा हुआ और राज्य की सरकार हो या प्रशासन वह जनता की रक्षा के लिए वचन वद्ध है लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम था कि इधर कुछ वर्षों से परिस्थितियां बदल गयी हैं। केंद्र और राज्य में बीजेपी सरकार है।
एक तो मौसम की ठण्ड ऊपर से ज़मीर और आत्मा की ठंडी, बस इसी लिए थोडा सा देश को जला दिया। सोशल मीडिया ने मोदी जी का बचाव किया और प्रदर्शनकारियों की भीड़ से बीजेपी, आरएसएस और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं की पहचान भी कर ली लेकिन पुलिस प्रशासन किसी भी तरह से मानने को तैयार ही नहीं और न ही राज्य की सरकार इसे गंभीरता से लेने को तैयार है।
यह सारा कुछ बीजेपी शासित राज्यों में ही अक्सर हो रहा है।
कुछ निराधारी लोग तो यह भी कह रहे हैं कि चूँकि मोदी जी के नए नेतृत्व में बीजेपी के कई पुराने नेता साइड लाइन हो गए तो जो कुछ हो रहा है उन की हाय लगी है।