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Friday, January 24, 2020

संविधान की लड़ाई को समुदाय का मुद्दा बनने से रोका जाये! Its fight for constitution not for Community


संविधान की लड़ाई को समुदाय का मुद्दा बनने से रोका जाये!

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
21वीं सदी का नया भारत भारतीय नागरिकों के लिए एक चुनौती बन कर आया। इस नए भारत की शुरुआत 19वीं सदी के आख़िरी दो दशकों से ही शुरू हो गयी थी। 1984, 1992 और फिर 1993 के हादसे भारत की संस्क्रति, लोकतंत्र और संविधान पर काले धब्बे हैं। यह सिलसिला रुका नहीं। 2002, 2011 और उस के बाद आज तक हर वर्ष कुछ ना कुछ ऐसा देखने को मिल रहा है जिस का सपना किसी भी लोकतंत्र देश ने नहीं देखा था।
इन दशकों में संविधान के लिए ही सब से बड़ी चुनौती थी और आज भी मूल मुद्दा भारत का लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक संविधान ही है। लेकिन इन बीते दशकों में सत्ता और विपक्ष, अल्प संख्यक और बहु संख्यक अथवा हिन्दू मुस्लिम के साथ उच्च जाति और पिछड़ी जाति की लड़ाई ने किसी का ध्यान इस और जाने ही नहीं दिया।
इन दशकों की राजनीति ने अपने राजनैतिक मुद्दों, नीतियों, विचारों और लक्ष्यों पर भ्रमित वक्तव्य का ऐसा मुखौटा डाला कि लोग मुद्दों पर बात कर ही नहीं पाए। इन पूरे दशकों में कभी भी किसी मुद्दे पर निष्कर्ष रुपी चर्चा नहीं हुई। एक मुद्दे को कोई निष्कर्ष मिलता उस से पहले कोई नया मुद्दा सामने आ जाता। उस पर गहन विचार शुरू हो जाता। किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले कोई और मुद्दा खड़ा हो जाता। इस बीच संविधान पर घात पर घात होती रही। लोग माइनॉरिटी और मेजोरिटी, इंडिया पाकिस्तान और राष्ट्रवाद एवं राष्ट्र द्रोह में उलझे रहे।
2014 में पूर्ण बहुमत से आयी आरएसएस समर्थित बीजेपी की सरकार ने बहुँत ज़्यादा कुछ नया नहीं किया। अंतर बस इतना था कि पहले चर्चा नहीं होती थी अब चर्चा होने लगी। पिछले दो दशकों की कांग्रेस सरकार में पुरानी कांग्रेस और नई कांग्रेस की एक बड़ी लड़ाई चली। राहुल गाँधी ने अपनी पार्टी की ग़लत नीतियों की सुधर करनी चाही तो अन्दर और बाहर दोनों तरफ से विरोध के ऐसे घातक वार हुए कि राहुल आत्म विश्वास खोने की कगार पर पहुँच गए। इसी लिए प्रियंका को भी सक्रिय राजनीति का हिस्सा नहीं बनने दिया गया।
बीजेपी के पूरे 6 साल के केंद्र के शासन काल में जब कभी भी रोज़गार, भुखमरी, शिक्षा, स्वास्थ, व्यसाय, किसान, सड़क, पानी बिजली इत्यादि समस्याओं पर गहन विचार विमर्श नहीं हो पाया। दो बड़े काम किये सौचालय और सिलेंडर लोगों तक पहुंचाए और कॉलोनियां भी बनवाई और इस में उन्हों ने कोई भेदभाव नहीं किया। लेकिन मूल समस्याओं से हमेशा भागते रहे।
पाकिस्तान, सीमा, सेना और राष्टवाद में जनता को इस क़दर फंसा दिया कि साल 2018-19 में बेरोज़गारी में हुयी आत्महत्याएं किसानों से जीत गयीं पता ही नहीं चला। यह भी नहीं पता चला कि 80 लाख बच्चे भुखमरी का शिकार हो गए जिन में 60-70% कुपोषण का शिकार हुए।
बीजेपी ने असल मुद्दे से भटकने का सुनियोजित प्लान भी बना लिया है। दो तरह के ग्रुप तैयार हुए। एक लठैतों का दूसरा बकैतों का। इन दोनों ने अपना काम बखूबी किया। देश में हिन्दू मुस्लिम और दलित ब्राह्मण चलता रहे इस का पूरा इंतज़ाम किया।
सरकार की नीतियों का जिस ने भी विरोध करना चाहा उसे राष्ट्रद्रोह या राष्ट्र विरोध का माला पहना दिया गया। या फिर सवाल करने पर विपक्ष के कंधे पर बंदूक रख दी गयी कि यह कोई नया काम नहीं है बल्कि पिछली सरकार ही की नीति है। जब उन का विरोध नहीं हुआ तो अब विरोध करना देश के साथ धोका है। मोदी जी और बीजेपी कब देश बन गए पता ही नहीं चला। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ पर सवाल कब राष्ट्र विरोधी हो गया मालूम ही नहीं हुआ।
इस सभी चीजों के बीच कब कब संविधान को ख़तरे में डाला गया किसी ने सोचा ही नहीं क्यूंकि सभी ने व्यक्ति, जातिगत, धार्मिक और सामाजिक परिवेश में सवाल किये। संविधान और लोकतंत्र कि दृष्टि से देखा ही नहीं।
आज भी बहुतायत यही हो रहा है। असल मुद्दे से भटक रहे हैं लोग। CAA, NRC, और NPR को लेकर कुछ जागरूकता हो आयी है। इसे किसी समुदाय विशेष का मसला ना मानते हुए संविधान की मूल भावना का मुद्दा बनाया है लेकिन इस के लिए तैयारी कितनी है इस पर नज़र होनी ज़रूरी है।
सुप्रीम कोर्ट में जिन लोगों द्वारा याचिकाएं दाखिल की गयी हैं उन में से कितने लोग किसी राजनैतिक पार्टी की विचारधारा से अलग हैं, कितने लोग सामूहिक समुदाय और संवैधानिक एवं लोकतान्त्रिक मूलभावना के साथ जुड़े हुए, याचिकाओं में किस चीज़ को केंद्र बिंदु बनाया गया है, जैसी चीजों पर भी गौर करने कि ज़रूरत है।
पिछला इतिहास तो यही रहा है हमारा वकील और हमारी वकालत........


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Wednesday, January 22, 2020

मिस्ड कॉल वाली सरकार और समर्थन में धरना प्रदर्शन Missed Call Based Govt and Protest in Support


मिस्ड कॉल वाली सरकार और समर्थन में धरना प्रदर्शन

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
आज़ाद भारत के इतिहास में इतना हास्य पद क़दम शायद ही किसी पन्ने में दर्ज किया गया हो जितना कि वर्तमान में बहुमत से आयी सरकार का है। सरकार ने राज्य सभा और लोक सभा दोनों सदनों में बहुमत के साथ नागरिकता संशोधन बिल पारित किया जो अभी क़ानून बन चुका है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद अध्यादेश/नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया है। दोनों सदनों में बहुमत से पारित होने वाला क़ानून जनता की अदालत में सवालों के घेरे में आ गया। सवाल भी उचित हैं। सरकार उस का सीधे जवाब देने से कतरा रही है। जब भी सवाल होता है सत्ता के धुरंधर उसे विपक्ष के कंधे पर रख देते हैं।

एक इंटरव्यू में जब देश के गृह मंत्री अमित शाह से यह सवाल पूछा गया कि नागरिकता संशोधन क़ानून से संवैधानिक मूल्य उस वक़्त टकराते हैं जब NRC में बाहर किये गए लोगों में से मुस्लिम के अलावा सभी को इस क़ानून के ज़रिये नागरिकता दे दी जाएगी लेकिन मुस्लिम को बाहर कर दिया जायेगा। जवाब में अमित शाह कहते हैं कि यह नागरिकता संशोधन कानून किसी भी भारतीय की नागरिकता छीनने के लिए नहीं है बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़गानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यक समुदाय यानि हिन्दू, बौद्ध, जैन, क्रिस्चियन इत्यादि को नागरिकता देने का क़ानून है। उस के बाद जब वो NRC पर आते हैं तो सीधे कांग्रेस के पास चले जाते हैं कि NRC कोई नया मुद्दा नहीं है बल्कि यह तो कांग्रेस के समय पर लागू होने कि बात की गई थी।
दूसरी सच्चाई यह है धर्म प्रताड़ना एक प्रोपेगंडा के अलावा कुछ नहीं क्यूंकि इस बिल या क़ानून में धर्म प्रताड़ना का कोई ज़िक्र तक नहीं है।
सवाल अभी भी वही हैं:
जब नागरिकता देने का प्रावधान पहले से ही था तो नए क़ानून की आवश्यकता क्यूँ पड़ी?
नागरिकता देने में इन्हीं तीन देशों का चुनाव क्यूँ किया गया?
इसे धर्म से क्यूँ जोड़ा गया?
अगर नागरिकता संशोधन कानून सिर्फ़ बाहर के लोगों को नागरिकता देने का क़ानून है तो क्या इसे NRC से पहले लागू किया जायेगा और NRC के बाद इस का उपयोग नहीं होगा? जब कि गृह मंत्री जी कह रहे हैं कि पहले NRC होगी फिर यह क़ानून लागू होगा?
अभी तक धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लोगों का कोई डाटा क्यूँ नहीं किया गया?
जब बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने लिस्ट मांगी कि जो भी बंगलादेशी भारत में हैं उन की सूची दे दो ताकि वो बांग्लादेशियों को अपने देश वापस बुला लें तो अब तक वह सूची बांग्लादेश को क्यूँ नहीं सौंपी गयी?
अब तक कितने घुसपैठियों को देश से निकाला गया है इस की कोई सूचना जारी क्यूँ नहीं की जाती?
असम में हुए NRC के बाद जो 19 लाख लोग बाहर हुए हैं उन का मामला अभी तक क्यूँ नहीं हल हो पाया?
एक राज्य में NRC के लिए 1600 करोड़ खर्च हुए थे। पूरे देश में NRC के लिए लगभग 55 हज़ार करोड़ खर्च होंगे। देश की मौजूदा आर्थिक मंदी को देखते हुए क्या देश इतने बड़े बजट के लिए तैयार है?
अगर वाकई में “सब चंगा सी” तो ख़ुद के ही पारित हुए क़ानून के समर्थन में देश में धरना प्रदर्शन क्यूँ कराये जा रहे हैं?
मिस्ड कॉल से समर्थन की आवश्यकता क्यूँ पड़ गई और मिस्ड कॉल नम्बर को प्रमोट करने के लिए अश्लील झूट का सहारा क्यूँ लिया गया?
देश में चल रही बहुमत की सरकार को अगर मिस्ड कॉल और धरना प्रदर्शन का सहारा लेना पड़े तो क्या यह नहीं समझ लेना चाहिए कि जनता क़ानून के विरोध में खड़ी है?
जब देश भर के लोगों को समझाने का प्लान सरकार के पास है विरोध में चल रहे धरना प्रदर्शनों पर सरकार के प्रतिनिधि क्यूँ नहीं जाते?
क्या अब सरकार से यह सवाल नहीं होना चाहिए कि उस के लिए देश बड़ा है या पार्टी?

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Monday, January 20, 2020

भारत का नया इन्कलाब, बाग़ी आग शाहीन बाग़ The News Revolution in India, Shaheen Bagh


भारत का नया इन्कलाब, बाग़ी आग शाहीन बाग़


[अब्दुल मोईद अज़हरी]
NRC, CAA और NPR के विरुद्ध धरना प्रदर्शन की बढ़ती सीमा और क्षेत्र अवधि विश्व के नामी, चर्चित, एतिहासिक और इतिहास के पन्नों पर अमर आंदोलनों में से एक दिल्ली का शाहीन बाग होता जा रहा है। महिला द्वारा संचालित शांति प्रदर्शन “बागी आग शाहीन बाग” इतने लम्बे दिनों तक चलने वाला एकलौता और एकमात्र इन्किलाबी आन्दोलन बनता जा रहा है। 2 डिग्री की ठंडी और बारिश भी इन महिलाओं का हौसला ना तोड़ सकी और न ही  500 रुपये की बिकाऊ औरतें कहने का घटिया इलज़ाम उन के इरादे नहीं तोड़ सका। इसी लिए देश के किसी भी कोने में महिलाओं द्वारा शुरू किये गए शाहीन बाग के समर्थन में प्रदर्शन को शाहीन बाग का नाम दिया जाने लगा।

इस प्रदर्शन में हर वर्ग के लोगों ने अपनी प्रतिष्ठा और प्रतिभा का प्रयोग किया। 2 माह का बच्चा इस ठिठुरती ठण्ड में आने वाले दिनों के लिए साक्ष्य बना तो 4 साल कि बच्चियों ने आज़ादी के नारे लगा कर भारत के भविष्य का एलान कर दिया। अंग्रेजों को भारत से भागते देखने वाली आँखों ने भी इस आन्दोलन को साहस दिया। दिल्ली की दादियों ने 80-90 वर्ष की आयु में घर में बैठ कर बेटों और बहुओं की सेवा पाने की बजाये देश को एक नई क्रांति देने के लिए सड़कों का रुख किया और सारी रात सड़क पर ही बैठ कर सरकार को उस की ग़लती चेताने का फैसला किया।
यह धरना इस लिए भी असाधारण है क्यूंकि इस शांति पूर्ण धरने को रोकने के लिए ऐसे ऐसे प्रयास किये गए जिस की उम्मीद कभी भी किसी सभ्य समाज या व्यक्ति से नहीं जा सकती है। इस धरने में बैठने वाली लड़कियों और औरतों में लॉ, साइंस, इकॉनमी, पोलिटिकल साइंस, मैथ और UPSC की तैयारी करने वाली देश बेटियां हैं। इन में से कुछ तो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की लॉयर हैं। अब ऐसे लोगों के बारे में घटिया मानसिकता के लोगों ने यह कह दिया कि उन्हें CAA का फुल फॉर्म भी नहीं पता आख़िर कार ऐसा हुआ कि ख़ुद गृह मंत्री इस मामले में फिसल गए।
बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। चरित्र और मानसिकता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इस प्रदर्शन में शामिल होने वाली औरतों में ओखला के बड़े बड़े बिल्डर्स और व्यवसाइयों के घर की महिलाएं हैं जो ख़ुद सड़क पर धरना में हैं और अपने बच्चों को भी साथ में रखती हैं। इन के बारे में यह कहा जाये कि वह 500 से 700 रुपये लेती हैं। भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने तो घटियापन की सारी हदें पार कर दीं और इन प्रदर्शनकारियों को “बिकाऊ औरतें शाहीन बाग की” कह डाला। दुर्भाग्यवश देश के मीडिया चैनल जो पत्रकारिता के माथे पर दलाली का एक दाग है उस ने ट्विटर पर इस नाम का ट्रेंड चला दिया। एक तरफ देश के प्रधान मंत्री देश की बेटियों को पढ़ाने और बचाने की बात कर रहे हैं दूसरी तरफ बीजेपी के ही नेता और एक मीडिया चैनल सर ए आम मोदी की इस स्कीम की बैंड बजा रहे हैं।
शाहीन बाग ने अपने शांति पूर्ण प्रदर्शन के अलावा धैर्य, सद्भाव और सामाजिक सौहार्द का जो उदहारण प्रस्तुत किया है वह अतुल्य और सराहनीय है। शाहीन बाग रोज़ एक नया रंग लेता हुआ नज़र आ रहा है।

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Friday, January 17, 2020

“मुल्ला” के इस्लाम में फंसा मुसलमानों का भविष्य Muslims Future in the hands of merchant clergy


“मुल्ला” के इस्लाम में फंसा मुसलमानों का भविष्य

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
अल्लाह और मुल्ला के बीच सही इस्लाम की परख की लड़ाई ने मुसलमानों को कई हिस्सों में बाँट दिया। यहाँ उन मुल्ला लोगों की बात हो रही है जिन का ज़िक्र अल्लामा इक़बाल ने अपने कई शेरों में किया है जैसे कि “मुल्ला की अजां और मुजाहिद की अजां और”। इस के अलावा यहाँ उन मोलवियों, मुफ्तियों, धर्म प्रचारकों और विचारकों की बात हो रही है जिन्हों ने सियासत के बाज़ार में इमान की सौदे बाज़ी की है, जिन्हों ने वर्तमान राजनीति में क़दम रखने का नेक और पुण्य का काम तो किया लेकिन अपने धार्मिक सिधान्तों, उसूलों, मूल्यों और नैतिकताओं की मौलिक पवित्रता से राजनीति के दामन में लगी स्वार्थ, ईर्ष्या, नफ़रत, दमन, अज्ञानता, भिन्नता, भेदभाव, भ्रष्टाचार और अराजकता की गंदगी को साफ़ कर के देश को मानवता और संविधान वादी बनाने की कोशिश करने और उस अखंडता, एकता और धर्म निरपेक्षता को बचाने में अपना सहयोग और योगदान देने की जगह वर्तमान की गन्दी राजनीति को अपने दामन व दस्तार में समेट कर इन्हों ने हमारे पूर्वजों को अपमानित करने का काम किया है।
धर्म के थोक विक्रेता शाह बानो केस से लेकर अब तक हर मोड़ पर अपने ही समुदाय को नाकाम होने के अनेकों मौके देते आये हैं। हालाँकि उस केस के बाद से कांग्रेस की उलटी गिनती शुरू हो गयी और आज विपक्ष का रोल निभाने के लायक़ भी बची नज़र नहीं आ रही है। लेकिन कांग्रेस को अभी भी थोक विक्रेता ही चाहिए। हर समुदाय से वो व्होल सेलर तलाश करते हैं। उन्हीं का पेट भरते हैं और आम आदमी को झूटे वादे और कभी ना पूरी होने वाली उम्मीद पर छोड़ देते हैं।
हालाँकि बीजेपी ने इस क्रम को तोड़ने की कोशिश की है लेकिन उस के पास मुलिम राष्ट्रीय मंच के नाम पर आरएसएस संचालित एक ऐसा संगठन है जो खुले तौर पर मुसलमानों को अपने और अपनी नीतियों के सामने खड़ा कर देते हैं।
आज जब कि पूरा देश NRC, CAA और NPR को लेकर सड़कों पर है। कोई भी थोक विक्रेता धरना प्रदर्शन के आस पास नज़र नहीं आ रहा है क्यूंकि इस आन्दोलन ने नागरिकता संशोधन क़ानून के साथ साथ तथाकथित मुस्लिम प्रतिनिधित्व से भी इनकार कर दिया है। आज देश के कोने कोने में हो रहे प्रदर्शन में इन की उपस्थिति को लगभग प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस का फ़ायदा या नुक़सान तो बाद में समझ में आएगा लेकिन एक नए नेतृत्व की शुरुआत हो चुकी है।
हैदराबाद में 4 जून को होने वाले प्रदर्शन में आंध्र प्रदेश और तेंलांगना की सैकड़ों तंजीमें थीं, लाखों की भीड़ थी, शहर कि गलियां इंसानी समंदर से भरी पड़ी थीं उस भीड़ में अगर कोई नहीं था तो आल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन और उस के नेता प्रमुख। जिस तरह से देश का सेक्युलर भारतीय आरएसएस और उस से समर्थित बीजेपी की धर्म पर आधारित राजनीति को नकारता है ठीक उसी तरह किसी और पार्टी या व्यक्ति की धार्मिक आधार की राजनीति को ना पसंद किया जा रहा है।
नए नेतृत्व के तलाश और चयन में थोडा वक़्त तो लगेगा लेकिन इस से देश और विशेष कर मुसलमानों का भविष्य उज्वल होगा, देश से नफरतें घटेंगी और सद्भाव का फिर से प्रचार प्रसार होगा। इस वक़्त देश भर में इस मोलवीवाद के विरुद्ध विचारों और विमर्शों की गंभीर लड़ाई इंडियन मुस्लिम अवेयरनेस मूवमेंट लड़ रहा है। जिस के सकारात्मक द्रश्य देखने को मिल रहे हैं। यह संगठन लेखकों, शायरों, पत्रकारों, राजनैतिक विश्लेषकों और विचारकों के साथ साथ नई पीढ़ी के युवाओं को मिला कर बनाया गया है।
यह लेख उन की गतिविधियों, तर्कों और विचारों पर आधारित है।

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Wednesday, January 8, 2020

JNU में आतंकी हमला, संघी साज़िश या चुनावी हिंसा?JNU Terror attack, conspiracy or political violence


JNU में आतंकी हमला, संघी साज़िश या चुनावी हिंसा?

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
JNU कैंपस में 5 जनवरी की रात को हुए आतंकी हमले की चरों और निंदा हो रही है। सत्ताधीश सरकार, दिल्ली पुलिस और JNU प्रशासन सवालों के घेरे में हैं। जवाब देने की बजाये उल्टा चोर कोतवाल को डांट रहा है। 30 से ज़्यादा छात्र इस आतंकी हमले में घायल हुए है साथ कुछ अध्यापकों को भी छोटें आयी हैं। JNU में हुई फीस वृधि को लेकर पिछले एक महीने से ज़्यादा दिनों से छात्र शांति पूर्ण धरना प्रदर्शन कर रहे थे। विश्वविद्यालय के कुलपति से मिल कर बात करने की भी मांग कर रहे थे लेकिन साहेब मिलने के लिए राज़ी नहीं हुए।

JNU भारत का एक ऐसा विश्वविद्यालय है जिस छात्र विदेशों में पढ़ाते हैं। देश के ब्यूरोक्रेट, प्रशासन, राजनीति, सामाजिक, न्यायिक, और आर्थिक व्यवस्थाओं में इस यूनिवर्सिटी का अतुल्य योगदान है। इस से बढ़कर सामाजिक, व्यावहारिक, संवैधानिक और लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति इस यूनिवर्सिटी ने सदैव एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भी संवैधानिक और और लोकतान्त्रिक ढांचे के साथ किसी भी तरह की छेड़ छाड़ हुई है इस शैक्षिक संस्थान ने अपनी आवाज़ बुलंद की है।
जिस तरह से इस यूनिवर्सिटी को कुतर्क, अमानवीय और अराजक राजनीति की आग में धकेल दिया गया है वह निंदनीय और शर्मनाक है। यह चिंता का विषय कैंपस प्रशासन, इस से जुड़े हुए छत्र संघ, अध्यापक संघ और यहाँ से पढ़ कर निकले हुए देश विदेश में सेवा दे रहे ओल्ड बॉयज संघ समेत सब के लिए है।
JNU पर होने वाला यह आतंकी हमला देश के किसी विश्वविद्यालय विशेष पर नहीं है। यह हमला देश के लोकतंत्र के ढांचे पर है संविधान के मूल्यों पर है। अगर आप सवाल बर्दाश्त नहीं कर सकते, अगर आप टिप्पड़ी पर धैर्य नहीं रख सकते, अगर आप प्रबंधन पर नियंत्रण नहीं रख सकते, अगर आप छात्रों के साथ तालमेल नहीं रख सकते तो आप को सत्ता त्याग देना चाहिए। प्रशासन हो, शासन या या संघ हो।
देश के लिए इस से बड़ा दुर्भाग्य पूर्ण विषय नहीं हो सकता कि अब विद्या मंदिरों पर होने वाले आतंकी हमलों की ज़िम्मेदारी लेने वाले संगठन भी देश में मौजूद हैं। उन्हें इस बात का गर्व है कि उन्हों ने हमला किया है। उस से भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि सत्ता राजनीति का इन्हें संरक्षण मिल रहा है।
सरकार अपनी नाकामी छुपाने के लिए आतंक का सहारा लेगी, इस से बड़ा देश के साथ मज़ाक और क्या हो सकता है। जिस तरह आतंकवादी संगठन लोगों में अपना खौफ़ और डर बढ़ाने के लिए अपने जुर्मों का प्रचार प्रसार करते हैं, और कोई संगठन खड़ा हो कर उस आतंक को जस्टिफाई करते हुए सरकारी प्रशासन का मज़ाक़ उडाता है लगभग यही द्रश्य देश में पिछले कुछ वर्षों से शुरू हो गया है।
मोब लिंचिंग कि विडियो वायरल करने के बाद गोडसे ज़िंदाबाद के नारे लगा कर गाँधी का अपमान शुरू हुआ और अब विद्या के मंदिर पर हमला करने के बाद हमले कि ज़िम्मेदारी लेने कि प्रक्रिया शुरू हो गई।
एक और काम किया गया कि लोकतंत्र से तानाशाही की तरफ बढ़ते क़दम के ख़िलाफ़ कोई भी विश्वविद्यालय आवाज़ ना उठा पाए इस के रोहित वेमुला की मौत को उसी का कसूरवार ठहरा कर JNU को बदनाम करने कि साज़िश रची गई। आज JNU पर अगर बुलडोज़र चलाने का फ़ैसला भी अगर सत्ताधीश पार्टी ले लेती है तो कुछ लोग उस का भी समर्थन करने के लिए खड़े हो जायेंगे।
सवाल यह है कि इन लोकतंत्र में विश्वास रखने वालों की संख्या ज़्यादा है या मजदूर समर्थकों की तादाद।
वह लोग कहाँ हैं जिन्हों ने JNU कैंपस की मिटटी से अपने वजूद को देश विदेश में एक सम्मानजनक नाम दिया है।