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Friday, January 24, 2020

संविधान की लड़ाई को समुदाय का मुद्दा बनने से रोका जाये! Its fight for constitution not for Community


संविधान की लड़ाई को समुदाय का मुद्दा बनने से रोका जाये!

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
21वीं सदी का नया भारत भारतीय नागरिकों के लिए एक चुनौती बन कर आया। इस नए भारत की शुरुआत 19वीं सदी के आख़िरी दो दशकों से ही शुरू हो गयी थी। 1984, 1992 और फिर 1993 के हादसे भारत की संस्क्रति, लोकतंत्र और संविधान पर काले धब्बे हैं। यह सिलसिला रुका नहीं। 2002, 2011 और उस के बाद आज तक हर वर्ष कुछ ना कुछ ऐसा देखने को मिल रहा है जिस का सपना किसी भी लोकतंत्र देश ने नहीं देखा था।
इन दशकों में संविधान के लिए ही सब से बड़ी चुनौती थी और आज भी मूल मुद्दा भारत का लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक संविधान ही है। लेकिन इन बीते दशकों में सत्ता और विपक्ष, अल्प संख्यक और बहु संख्यक अथवा हिन्दू मुस्लिम के साथ उच्च जाति और पिछड़ी जाति की लड़ाई ने किसी का ध्यान इस और जाने ही नहीं दिया।
इन दशकों की राजनीति ने अपने राजनैतिक मुद्दों, नीतियों, विचारों और लक्ष्यों पर भ्रमित वक्तव्य का ऐसा मुखौटा डाला कि लोग मुद्दों पर बात कर ही नहीं पाए। इन पूरे दशकों में कभी भी किसी मुद्दे पर निष्कर्ष रुपी चर्चा नहीं हुई। एक मुद्दे को कोई निष्कर्ष मिलता उस से पहले कोई नया मुद्दा सामने आ जाता। उस पर गहन विचार शुरू हो जाता। किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले कोई और मुद्दा खड़ा हो जाता। इस बीच संविधान पर घात पर घात होती रही। लोग माइनॉरिटी और मेजोरिटी, इंडिया पाकिस्तान और राष्ट्रवाद एवं राष्ट्र द्रोह में उलझे रहे।
2014 में पूर्ण बहुमत से आयी आरएसएस समर्थित बीजेपी की सरकार ने बहुँत ज़्यादा कुछ नया नहीं किया। अंतर बस इतना था कि पहले चर्चा नहीं होती थी अब चर्चा होने लगी। पिछले दो दशकों की कांग्रेस सरकार में पुरानी कांग्रेस और नई कांग्रेस की एक बड़ी लड़ाई चली। राहुल गाँधी ने अपनी पार्टी की ग़लत नीतियों की सुधर करनी चाही तो अन्दर और बाहर दोनों तरफ से विरोध के ऐसे घातक वार हुए कि राहुल आत्म विश्वास खोने की कगार पर पहुँच गए। इसी लिए प्रियंका को भी सक्रिय राजनीति का हिस्सा नहीं बनने दिया गया।
बीजेपी के पूरे 6 साल के केंद्र के शासन काल में जब कभी भी रोज़गार, भुखमरी, शिक्षा, स्वास्थ, व्यसाय, किसान, सड़क, पानी बिजली इत्यादि समस्याओं पर गहन विचार विमर्श नहीं हो पाया। दो बड़े काम किये सौचालय और सिलेंडर लोगों तक पहुंचाए और कॉलोनियां भी बनवाई और इस में उन्हों ने कोई भेदभाव नहीं किया। लेकिन मूल समस्याओं से हमेशा भागते रहे।
पाकिस्तान, सीमा, सेना और राष्टवाद में जनता को इस क़दर फंसा दिया कि साल 2018-19 में बेरोज़गारी में हुयी आत्महत्याएं किसानों से जीत गयीं पता ही नहीं चला। यह भी नहीं पता चला कि 80 लाख बच्चे भुखमरी का शिकार हो गए जिन में 60-70% कुपोषण का शिकार हुए।
बीजेपी ने असल मुद्दे से भटकने का सुनियोजित प्लान भी बना लिया है। दो तरह के ग्रुप तैयार हुए। एक लठैतों का दूसरा बकैतों का। इन दोनों ने अपना काम बखूबी किया। देश में हिन्दू मुस्लिम और दलित ब्राह्मण चलता रहे इस का पूरा इंतज़ाम किया।
सरकार की नीतियों का जिस ने भी विरोध करना चाहा उसे राष्ट्रद्रोह या राष्ट्र विरोध का माला पहना दिया गया। या फिर सवाल करने पर विपक्ष के कंधे पर बंदूक रख दी गयी कि यह कोई नया काम नहीं है बल्कि पिछली सरकार ही की नीति है। जब उन का विरोध नहीं हुआ तो अब विरोध करना देश के साथ धोका है। मोदी जी और बीजेपी कब देश बन गए पता ही नहीं चला। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ पर सवाल कब राष्ट्र विरोधी हो गया मालूम ही नहीं हुआ।
इस सभी चीजों के बीच कब कब संविधान को ख़तरे में डाला गया किसी ने सोचा ही नहीं क्यूंकि सभी ने व्यक्ति, जातिगत, धार्मिक और सामाजिक परिवेश में सवाल किये। संविधान और लोकतंत्र कि दृष्टि से देखा ही नहीं।
आज भी बहुतायत यही हो रहा है। असल मुद्दे से भटक रहे हैं लोग। CAA, NRC, और NPR को लेकर कुछ जागरूकता हो आयी है। इसे किसी समुदाय विशेष का मसला ना मानते हुए संविधान की मूल भावना का मुद्दा बनाया है लेकिन इस के लिए तैयारी कितनी है इस पर नज़र होनी ज़रूरी है।
सुप्रीम कोर्ट में जिन लोगों द्वारा याचिकाएं दाखिल की गयी हैं उन में से कितने लोग किसी राजनैतिक पार्टी की विचारधारा से अलग हैं, कितने लोग सामूहिक समुदाय और संवैधानिक एवं लोकतान्त्रिक मूलभावना के साथ जुड़े हुए, याचिकाओं में किस चीज़ को केंद्र बिंदु बनाया गया है, जैसी चीजों पर भी गौर करने कि ज़रूरत है।
पिछला इतिहास तो यही रहा है हमारा वकील और हमारी वकालत........


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Friday, January 3, 2020

आखिर बीजेपी मोदी जी से ख़ुश क्यूँ नहीं है?Why BJP or RSS not haapy with Modi?


आखिर बीजेपी मोदी जी से ख़ुश क्यूँ नहीं है?

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी, जिन के मन की बात और वतन की बात के प्रोग्रामों में किसी भी तरह के सांप्रदायिक वक्तव्य, भेदभाव की भावना या अलगाववाद के विचार और प्रचार को निराधार किया जाता है। देश में शांति व्यवस्था बनाये रखने और किसी भी नागरिक के साथ अनैतिक व्यवहार का बर्ताव न किये जाने की वकालत भी वो करते हैं और उस का आदेश और निर्देश भी देते हैं।

लेकिन बीजेपी शासित राज्यों कि सरकारें, उन के मंत्री और पुलिस प्रशासन देश के प्रधानमंत्री की किसी भी बात को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं। NRC, CAA और NPR को लेकर देश भर में शांति प्रदर्शन हुए कहीं से भी पुलिसिया दमन और प्रशासनिक बर्बरता की ख़बरें इतनी नहीं आयी हैं जितनी कि बीजेपी शासित राज्यों से आ रही हैं। दंगाई भी इस मामले में माननीय प्रधानमंत्री जी को धोका और चकमा दे गए। जब प्रधानमंत्री ने दंगाइयों को कपडे से पहचानने की सलाह दी तो कमबख्तों ने वही कपड़े और ड्रेस ख़रीदने शुरू कर दिए। मानो ऐसा को कि मोदी ने कहा हो कि दंगा करना हो तो इस ड्रेस या इस ख़ास कपडे को पहन कर करना।
 अकेले बंगाल के एक दुकानदार के बयान के मुताबिक उस के यहाँ का वो ख़ास लिबास जिस की तरफ़ प्रधानमंत्री जी ने इशारा दिया था एक हफ्ते के अन्दर इतना बिका जितना कि साल भर में नहीं बिका था। हैरानी की बात यह है कि ख़रीदारों में बड़ी तादाद बीजेपी सदस्यों की थी।


राम रहीम के केस में कोर्ट ने आदेश दिया था कि बाबा के समर्थकों द्वारा देश की जितनी संपत्ति का नुकसान हुआ है उस का उसे राम रहीम की जायदाद से वसूला जायेगा। अब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने सोचा अब कोर्ट कचेहरी की क्या ज़रूरत है यूपी में हमारी सरकार है इसलिए उन्हों ने कहा की इस का बदला लिया जायेगा। यही नहीं बदला जिस से चाहेंगे उस से ले लेंगे। राह चले क्सिसी को भी पकड़ लिया। मारा पीटा जेल किया और नोटिस भी भेज दी।
हद तो यह है कुछ मृतकों के नाम भी नोटिस भेज दी है। इस से पहले भी बीजेपी के कुछ धुरंधर मुस्लिम महिलाओं को क़ब्र निकाल कर उन के साथ दुष्कर्म करने कि मंशा जाता चुके हैं इस लिए योगी जी ने भी नोटिस कब्रिस्तान को भेज दिया।
यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कहते थे कि पुलिस उन की सुनती ही नहीं यहाँ अभी योगी जी का बदला वाला बयान टीवी पर चला ही था कि यूपी में कारगिल युद्ध हो गया।
आन की आन में यूपी के दसियों जिलों में ऐसी गोलियां चलीं मानों अब देश का बॉर्डर कश्मीर नहीं यूपी हो। 20 के क़रीब लोगों को मार दिया गया। प्रदर्शन करने वालों कि ग़लती यह थी वह संविधान बचाने के लिए शांतपूर्ण प्रदर्शन करने निकले थे। उन्हें लग रहा था कि अभी देश का लोकतंत्र बचा हुआ और राज्य की सरकार हो या प्रशासन वह जनता की रक्षा के लिए वचन वद्ध है लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम था कि इधर कुछ वर्षों से परिस्थितियां बदल गयी हैं। केंद्र और राज्य में बीजेपी सरकार है।
एक तो मौसम की ठण्ड ऊपर से ज़मीर और आत्मा की ठंडी, बस इसी लिए थोडा सा देश को जला दिया। सोशल मीडिया ने मोदी जी का बचाव किया और प्रदर्शनकारियों की भीड़ से बीजेपी, आरएसएस और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं की पहचान भी कर ली लेकिन पुलिस प्रशासन किसी भी तरह से मानने को तैयार ही नहीं और न ही राज्य की सरकार इसे गंभीरता से लेने को तैयार है।
यह सारा कुछ बीजेपी शासित राज्यों में ही अक्सर हो रहा है।
कुछ निराधारी लोग तो यह भी कह रहे हैं कि चूँकि मोदी जी के नए नेतृत्व में बीजेपी के कई पुराने नेता साइड लाइन हो गए तो जो कुछ हो रहा है उन की हाय लगी है।





Thursday, January 2, 2020

कांग्रेस की समस्या ख़ुद कांग्रेस है और हल भीThe Problem with Congress is the party and solution as well


कांग्रेस की समस्या ख़ुद कांग्रेस है और हल भी

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
एक सीट पर गुज़ारा करने वाली भारतीय जनता पार्टी 303 सीटों पर केसरिया विजयी ध्वज फहराएगी किसी ने सोचा नहीं होगा। 414 का कीर्तिमान रचने वाली कांग्रेस पार्टी इतना लाचार व बेबस हो जायेगी इस का अंदाज़ा किसी के सपने में नहीं हुआ होगा। राहुल गाँधी के नेतृत्व में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जीतने के बाद 2019 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए इतना मुश्किल हो जायेगा कि महीनों इस पार्टी को अध्यक्ष तक नसीब न हो यह द्रश्य कांग्रेस के इतिहास में सब से अँधेरा दिन से याद किया जायेगा।
आज भी कांग्रेस के पास अपने अंतर्युध से निकलने का कोई रास्ता नहीं है। बीजेपी के पास इतने महान दिमागी नेता नहीं हैं जितने कांग्रेस के पास बादशाही मिज़ाज वाले लीडर हैं। उन का हर नेता प्रधान मंत्री से कम नहीं है। कांग्रेस की राजनैतिक नैया ऐसे नेताओं के सहारे मंजधार में फंसती जा रही है जो एक एक कर के बीजेपी में शामिल हो रहे हैं।
 जिस वक़्त कांग्रेस को एक संजय गाँधी की ज़रूरत थी और राहुल गाँधी ने अपने आप को शहज़ादे के बचपने से निकालने कि कोशिश भी लेकिन वहां इतने बादशाह अकबर बैठे हुए हैं कि सलीम को मुहब्बत तो दूर की बात है इज़हार ए मुहब्बत भी नहीं करने दे सकते।
परिस्थिति इतनी असमंजस की हो गयी कि 2019 के चुनावी घोषणा पत्र के किसी पन्ने या लाइन में कांग्रेस मुसलमान शब्द का प्रयोग नहीं कर पायी जबकि अगर जातिगत विश्लेषण की द्रष्टि से बीते लोकसभा चुनाव का आंकलन किया जाये तो कांग्रेस के पास मुसलमानों से बड़ा सपोर्ट किसी दूसरी बिरादरी का नहीं था। 
बीजेपी के इस बयान को आज भी कांग्रेस सिद्ध करती हुई नज़र आ रही है कि कांग्रेस ने सदैव मुसलमानों को बीजेपी और आरएसएस से डरा कर उन का वोट हासिल करने की कोशिश की है और इस काम के लिए होल सेलर मुस्लिम क्लेर्जी और पेशावर मुस्लिम नेता का इस्तेमाल किया है। 

कांग्रेस के इन दलाल मोलवियों और नेताओं ने हर बार मुसलमानों का कांग्रेस के साथ सौदा किया। हालाँकि उन्हीं बिचौलिए दलालों ने राजीव गाँधी को बहला फुसला कर शाह बानो केस में कांग्रेस की नैया को डुबो भी दिया। क्यूंकि बाबरी मस्जिद पर ताला लगने के बाद उस का ताला खुलवाने में इन्हीं मोलवियों के मनगढ़ंत दलीलें थीं जिस ने कांग्रेस का सूरज तो डुबा ही दिया साथ ही मुसलमानों का भविष्य भी अंधकार के हवाले कर दिया।
आज भी कांग्रेस उन परिस्थितिओं से निकल नहीं पा रही है। अपने इर्द गिर्द के फरेबी जालों से बाहर झाँकने कि कोशिश नहीं कर रही है। 
आज जिस तरह मुसलमान अपने हम वतन भाइयों के साथ सड़कों पर है, गोलियां, लाठियां, और गालियाँ खा रहे हैं, बच्चे, बूढ़े, औरतें इस ठिठुरती ठण्ड में सडकों पर बैठी हैं, नौजवान जेलों में हैं, छात्र मुक़दमों की मार झेल रहे हैं, कांग्रेस पार्टी अभी भी सेफ ज़ोन से बाहर निकलने को तैयार नहीं। सपा और बसपा कि तरह दूर से हाथ बढ़ा रहे हैं।
 और इस आन्दोलन को कैश करने कि कोशिश भी कर रहे हैं। लेकिन खुल कर साथ देने को तैयार नहीं है।



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Tuesday, December 31, 2019

क्या यह पीएम मोदी के खिलाफ़ कोई साज़िश है?Is it any conspiracy against PM Modi?


क्या यह पीएम मोदी के खिलाफ़ कोई साज़िश है?

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
NRC, CAA, और NPR को लेकर जिस तरह देश में विरोध देखने को मिल रहा उस से एक बात तो साफ़ और स्पष्ट होती जा रही है कि देश के वर्तमान प्रधानमंत्री से ख़ुद बीजेपी और आरएसएस संगठन के कुछ लोग ख़ुश नहीं हैं। पीएम मोदी की बढ़ती देश विदेश में ख्याति कुछ लोगों की आँखों में खटक रही हैं।
साल 2019 में मोदी 2.0 का आरम्भ था, देश को नई दिशा देने की तैयारी थी, लगा शायद देश की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा इस नए सत्र में संभव है जिस की संभावनाएं बीते वर्ष में ख़त्म कर दी गयीं थी। पीएम मोदी के दूसरे सत्र की शुरुआत तीन जुमलों से हुई जिसे बाद में समर्थकों के बीच में ही मौजूद मोदी विरोधी विचारधारा ने जुमले बाज़ी में बदल दिया।
“सब का साथ”, “सब का विकास” से एक क़दम आगे बढ़ते हुए मोदी सरकार ने “सब का विश्वास” स्कीम को लांच किया। अभी दिन के उजाले में इस नीति का एलान हुआ ही था कि मोदी के उगते सूरज को उन के समर्थकों ने सूर्यास्त करते हुए उसी संध्या को मोब लिंचिंग द्वारा पीएम मोदी के सपनों पर घातक प्रहार किया। जिन लोगों का विश्वास मोदी सरकार का दूसरा सत्र पाना चाहता था इस मोदी विरोधी दल ने उसे प्रताड़ित करते हुए यह सन्देश देने कि कोशिश की कि प्रधानमंत्री के भाषण पर विश्वास करने की ज़रूरत नहीं है।
पीएम मोदी अपने भाषणों में यह कहते रहे कि बीजेपी पार्टी और सरकार में ऐसे किसी व्यक्ति की जगह नहीं जो राष्ट्र हिट के विरुद्ध हो। उन्हों ने तो अपने एक महिला सांसद से भी नज़रें फेर लीं थी जिन्हों ने महात्मा गाँधी का अपमान किया लेकिन मोदी विरोधी दल ने पीएम मोदी पर फिर प्रहार किया और चुनाव में ऐसे ही अधिक चेहरे उतारे जो अपराधिक मामलों में लिप्त थे।
उधर पीएम मोदी रात दिन मेहनत कर के देश विदेश के दौरे करते रहे इधर पार्टी और संगठन के अन्दर ही मौजूद मोदी विरोधी दल पीएम मोदी के सपनों पर घात पर घात करते रहे। इतने हमले किये कि गुजरात के विकास मॉडल पर पूरे देश में चुनाव में उतरने वाले मोदी को गुजरात के विनाश और दंगे वाले मॉडल में बदल दिया।
आज जब कि पूरा देश क़ानून विशेष को लेकर चिंतित है, विरोध प्रकट कर रहा है, देश जल रहा है, पीएम मोदी बार बार कह रहे हैं कि देश भर में NRC या CAA लागू करने की उन की कोई मंशा नहीं है लेकिन आंतरिक विरोधियों ने एक बार फिर पीएम मोदी पर करारा वार करते हुए खुल कर एलान किया कि NRC देश भर में लागू होगा।
पीएम मोदी के “सब का विश्वास” पर फिर हमला किया गया और कहा गया कि CAA के ज़रिये हम पड़ोसी देशों के करोड़ों हिन्दुओं, बोधों, और अन्य अल्पसंख्यकों को देश की नागरिकता तो देंगे लेकिन NRC के ज़रिये बिना किसी धार्मिक और जातिगत भेदभाव के हर वो व्यक्ति इस क़ानूनी शिकंजे का शिकार होगा जो भारत की नागरिकता साबित करने में असफल होगा। चूँकि अब तक प्रमाणित करने वाले दस्तावेज़ की कोई यकीनी प्रक्रिया स्पष्ट नहीं की गयी लेकिन अभी तक जो भी दस्तावेज़ मांगने की बात कि गयी है उस से असम की तरह हिन्दू मुस्लिम दोनों ही बाहर होंगे सिर्फ इस लिए नहीं कि वो देश के नागरिक नहीं है या घुसपैठिये हैं बल्कि इस्ल लिए भी क्यूंकि उन के पास दस्तावेज़ नहीं हैं।
इस तरह के विवादित बयान देने वाले मोदी विचारधारा के प्रचारक संसद और मंत्रालय में बहुत जो शायद पीएम मोदी इस उड़ान को रोकना चाहते हैं। शायद इस वक़्त पीएम मोदी को सच्चे समर्थकों की सख्त ज़रूरत है जो इस तरह के विचारकों और प्रचारकों से इस का हिसाब मांग सकें।