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Friday, January 3, 2020

आखिर बीजेपी मोदी जी से ख़ुश क्यूँ नहीं है?Why BJP or RSS not haapy with Modi?


आखिर बीजेपी मोदी जी से ख़ुश क्यूँ नहीं है?

[अब्दुल मोईद अज़हरी]
भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी, जिन के मन की बात और वतन की बात के प्रोग्रामों में किसी भी तरह के सांप्रदायिक वक्तव्य, भेदभाव की भावना या अलगाववाद के विचार और प्रचार को निराधार किया जाता है। देश में शांति व्यवस्था बनाये रखने और किसी भी नागरिक के साथ अनैतिक व्यवहार का बर्ताव न किये जाने की वकालत भी वो करते हैं और उस का आदेश और निर्देश भी देते हैं।

लेकिन बीजेपी शासित राज्यों कि सरकारें, उन के मंत्री और पुलिस प्रशासन देश के प्रधानमंत्री की किसी भी बात को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं। NRC, CAA और NPR को लेकर देश भर में शांति प्रदर्शन हुए कहीं से भी पुलिसिया दमन और प्रशासनिक बर्बरता की ख़बरें इतनी नहीं आयी हैं जितनी कि बीजेपी शासित राज्यों से आ रही हैं। दंगाई भी इस मामले में माननीय प्रधानमंत्री जी को धोका और चकमा दे गए। जब प्रधानमंत्री ने दंगाइयों को कपडे से पहचानने की सलाह दी तो कमबख्तों ने वही कपड़े और ड्रेस ख़रीदने शुरू कर दिए। मानो ऐसा को कि मोदी ने कहा हो कि दंगा करना हो तो इस ड्रेस या इस ख़ास कपडे को पहन कर करना।
 अकेले बंगाल के एक दुकानदार के बयान के मुताबिक उस के यहाँ का वो ख़ास लिबास जिस की तरफ़ प्रधानमंत्री जी ने इशारा दिया था एक हफ्ते के अन्दर इतना बिका जितना कि साल भर में नहीं बिका था। हैरानी की बात यह है कि ख़रीदारों में बड़ी तादाद बीजेपी सदस्यों की थी।


राम रहीम के केस में कोर्ट ने आदेश दिया था कि बाबा के समर्थकों द्वारा देश की जितनी संपत्ति का नुकसान हुआ है उस का उसे राम रहीम की जायदाद से वसूला जायेगा। अब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने सोचा अब कोर्ट कचेहरी की क्या ज़रूरत है यूपी में हमारी सरकार है इसलिए उन्हों ने कहा की इस का बदला लिया जायेगा। यही नहीं बदला जिस से चाहेंगे उस से ले लेंगे। राह चले क्सिसी को भी पकड़ लिया। मारा पीटा जेल किया और नोटिस भी भेज दी।
हद तो यह है कुछ मृतकों के नाम भी नोटिस भेज दी है। इस से पहले भी बीजेपी के कुछ धुरंधर मुस्लिम महिलाओं को क़ब्र निकाल कर उन के साथ दुष्कर्म करने कि मंशा जाता चुके हैं इस लिए योगी जी ने भी नोटिस कब्रिस्तान को भेज दिया।
यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कहते थे कि पुलिस उन की सुनती ही नहीं यहाँ अभी योगी जी का बदला वाला बयान टीवी पर चला ही था कि यूपी में कारगिल युद्ध हो गया।
आन की आन में यूपी के दसियों जिलों में ऐसी गोलियां चलीं मानों अब देश का बॉर्डर कश्मीर नहीं यूपी हो। 20 के क़रीब लोगों को मार दिया गया। प्रदर्शन करने वालों कि ग़लती यह थी वह संविधान बचाने के लिए शांतपूर्ण प्रदर्शन करने निकले थे। उन्हें लग रहा था कि अभी देश का लोकतंत्र बचा हुआ और राज्य की सरकार हो या प्रशासन वह जनता की रक्षा के लिए वचन वद्ध है लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम था कि इधर कुछ वर्षों से परिस्थितियां बदल गयी हैं। केंद्र और राज्य में बीजेपी सरकार है।
एक तो मौसम की ठण्ड ऊपर से ज़मीर और आत्मा की ठंडी, बस इसी लिए थोडा सा देश को जला दिया। सोशल मीडिया ने मोदी जी का बचाव किया और प्रदर्शनकारियों की भीड़ से बीजेपी, आरएसएस और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं की पहचान भी कर ली लेकिन पुलिस प्रशासन किसी भी तरह से मानने को तैयार ही नहीं और न ही राज्य की सरकार इसे गंभीरता से लेने को तैयार है।
यह सारा कुछ बीजेपी शासित राज्यों में ही अक्सर हो रहा है।
कुछ निराधारी लोग तो यह भी कह रहे हैं कि चूँकि मोदी जी के नए नेतृत्व में बीजेपी के कई पुराने नेता साइड लाइन हो गए तो जो कुछ हो रहा है उन की हाय लगी है।





Saturday, February 9, 2019

मोदी अगर क़ातिल है तो मसीहा कौन है?If Modi is Murdere, who is saviour?


मोदी अगर क़ातिल है तो मसीहा कौन है?

अब्दुल मोईदअज़हरी
2019 का लोकसभा चुनाव क़रीब है। लोभ लुभावन कार्यक्रम शीर्ष पर है। आरोप प्रत्यारोप की प्रकिया भी चरम सीमा पर है। व्हाट्स एप कॉलेज और फेसबुक यूनिवर्सिटी विचारों के आदान प्रदान में व्यस्त हैं। इन तीन महीनों में हर गली कूचे में बैठा हुआ बेरोज़गार युवा घर के किसी कोने में बैठ कर मोबाइल की स्क्रीन पर देश की दिशा और दशा पलट रहा होगा। जीत और हार के फैसलों के साथ सियासी रणनीतियों का गहरा अध्ययन करने के पश्चात वफादारी और ग़द्दारी के सर्टिफिकेट भी बाँट रहा होगा। इन तमाम कुलेखनों के सोर्स और माध्यम इस वक़्त देश के दो सब से बड़े विश्व विख्यात और प्रचलित खोज ख़बर के संस्थान व्हाट्स एप और फेसबुक होंगे। देश, समुदाय, भाषा और संस्कृति के अलावा संविधान की रक्षा भी इन्हीं दोनों संस्थानों से सुनिश्चित कराने की जंग होगी। जिस के ताज़ा नमूने हम और आप देख रहे हैं।
हालाँकि धर्म, जाति और समुदाय के नाम पर राजनीति अपने आप में एक कुरीति जिसे बंद होना चाहिए लेकिन अब देश की राजनीति इस की जकड़ में है। यूपी और बिहार इस मामले में उच्च स्थान पर हैं।
मुसलिम समुदाय में आज का गरम मुद्दा यह है कि अगर बीजेपी वापस सत्ता में आ गई तो मुसलमानों को पाकिस्तान भेज दिया जायेगा। संविधान बदल दिया जायेगा और देश को हिन्दू राष्ट्र में बदल दिया जायेगा। इस लिए किसी भी सूरत में देश से भाजपा को हटाने के लिए एकजुट होने की आवश्यकता है। इन सब की ज़िम्मेदारी सब से ज़्यादा मुसलमानों पर है।
बीजेपी, मोदी, और आरएसएस के मुसलमानों के क़ातिल होने की जितनी चर्चा देश में हुई है उतनी चर्चा कभी मुज़फ्फर नगर, केराना, बाबरी मस्जिद, 1984 के सिख नर संहार जैसे अनेकों सांप्रदायिक दंगों की नहीं होती जिन में पिछले 4 सालों में मोब लिंचिंग में क़त्ल किये गए पचासों बे गुनाहों से कहीं ज़्यादा लोग, घर और परिवार जला दिए गए भगा दिया गए। क्यूँ?
हर बेगुनाह का क़त्ल क़त्ल है और हर क़ातिल क़ातिल है इस विचार पर चर्चा क्यूँ नहीं होती?
हर इलेक्शन में मुसलमानों का वोट उन्हें डरा कर लिया जाता है। डर कर डाले गए वोट की कोई कीमत नहीं होती। क्यूँ कि जब किसी पार्टी को यह एहसास हो जाये की उसे वोट देना मुसलमानों की मजबूरी है तो उस के विकास और भागीदारी की बात क्यूँ होगी।
हर चुनाव में इस्लाम ख़तरे में होता और यह ख़तरा पिछले कई दशकों से है। अन्दर की जंग पर तो कोई लगाम नहीं है। एक कलमा, एक खुदा, एक क़ुरान और एक रसूल के मानने वालों का इत्तेहाद किसी भी समाजी व सियासी मामलों में अब तक नहीं हो सका लेकिन इलेक्शन के टाइम पर ज़बानी इस्लाम की हिफाज़त का ज़िम्मा सर पर होता है। अक़ीदा तो यह है कि इज्ज़त, ज़िल्लत, ज़िन्दगी और मौत ख़ुदा के अख्तियार में है लेकिन ….
देश का छोटा से छोटा वर्ग और समुदाय राजनीती में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए लड़ाई लड़ रहा है और 20% आबादी वाला समुदाय या तो दीन बचा रहा है ज़बानी जिहाद कर के एक दूसरे का अक़ीदा सही और ग़लत करने में लगा है।
इस वर्चुअल डर से बाहर निकल कर सियासी भागीदारी और सत्ता में हिस्सेदारी के लिए मुसलमान फिक्र मंद कब होगा?
कब तक मोदी क़ातिल नाम पर अपनी वोट की ताक़त को कचरे में डालता रहेगा? अभी तय कर लो। तुम्हें तुम्हारा सियासी अधिकार देने के लिए कौन तैयार है? मोदी अगर क़ातिल है तो मसीहा कौन है?

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Friday, January 5, 2018

तीन तलाक़ बिल: मुस्लिम विद्वानता पर प्रश्न चिन्हتین طلاق بل: مسلم دانشوری پر سوالیہ نشانTriple Talaq Bill:Question mark on Muslim intelligence


تین طلاق بل: مسلم دانشوری پر سوالیہ نشان
عبد المعید ازہری

لوک سبھامیں تین طلاق کو پابندکئے جانے کے متعلق بل پیش ہو کر پاس بھی ہو گیا۔ البتہ ابھی راجیہ سبھا میں اس پر بحث ہونا باقی ہے۔بل کے مختلف پہلؤں پر متعدد باتیں بھی عوامی میڈیا کے ذریعے سامنے آچکی ہیں۔حالات ایسے بنا دئے گئے ہیں کہ لگتا ہے کہ ملک بھی یہی چاہتا ہے کہ اس بل کو پاس ہی کیا جانا چاہئے تھا۔پھر کچھ نادان مسلمان نہ جانے کیوں مظاہر ہ، مخالفت اور ضد پا آمادہ ہیں۔ کیا ان کا یہ احتجاج، مظاہرہ یا ضد اس بل کے پاس یا رد ہونے میں کوئی کردار ادا کر سکتا ہے، یہ ایک اہم سوال ہے۔ جس کا ابھی تک کوئی معقول جواب موصول ہونا باقی ہے۔کچھ مسلمانوں اور اکثر ہندوستانیوں کا یہ خیال ہے کہ بی جے پی واضح طور پر ایک مذہبی اور نظریاتی پشت پناہی میں کام کرنے والی سیاسی پارٹی ہے۔ یہ مسلمانوں کی کھلی مخالف ہے۔ بی جے پی نے اسے جھوٹا ثابت کرنے کے لئے مسلم خواتین کے حق میں آواز بلند کی اور تین طلاق کے ذریعے ان پر ہونے والے مظالم کے خلاف پارلیا منٹ میں ایک بل پاس کر دیا۔بی جے پی کی یہ مسلم دوستی کتنا سیاسی اور کتنا سماجی ہے، اس کے لئے حق شناس اور حق گو انسان درکار ہیں۔ جو اس وقت تقریبا معدوم ہیں۔ لیکن بی جے پی حکومت کے اس اقدام کے بعد کیا اس کی امید کی جائے کہ بیس لاکھ سے زائد ہندو خواتین کے لئے بھی حکومت کوئی اقدام کرے گی جنہیں بے گھر اور بے آسرا چھوڑ دیا گیا۔ ان کی صورت تو ان مسلم خواتین سے بھی بدتر ہے کہ وہ دوسری شادی بھی نہیں کر سکتیں۔ کیا یہ حکومت ان خواتین کو انصاف دلانے کے لئے کوئی اقدام کرے گی یا صرف انہیں ملک کے اس خاص مسلم طبقے کی خواتین سے ہمدردی ہے اور باقی کو قدرت کے سہارے چھوڑ دیا ہے۔
پاس ہونے والے اس بل کے متعلق یہ اشکال بر قرار ہے کہ کیا سپریم کورٹ نے اپنے پرانے فیصلے میں کسی ایسے بل کے پیش کرنے کی بات کہی تھی۔ کیا یہی وہ بل ہے جس کا تقاضہ کچھ مسلم خواتین نے میڈیا کے سامنے آکر اپنی مظلومیت کی داستان سنا کر کیا تھا۔ چونکہ یہ خالص مذہب سے متعلق بل ہے؟ تو کیا یہ ضروری نہیں ہے کہ کسی مذہب و عقیدے سے متعلق کوئی قانون بنانے سے پہلے ان سے اس بابت بات کی جائے۔ اس طرح کے کئی سوال ہیں جن کے جواب آنے باقی ہیں۔ لوک سبھا کے بعد ابھی راجیہ سبھا میں اس پر بحث ہونا باقی ہے۔ تو کیا راجیہ سبھا میں موجود مسلم ممبران اس بل کی اہمیت و افادیت یا پھر اس سے متعلق اشکال و اعتراضات کے لئے تیار ہیں۔یا ان کا غم و غصہ فقط بندکمروں کی آواز بن کر ہوا میں دم گھونٹ دے گا۔
اس نازک معاملے کو کورٹ کچہری کے چکر لگاتے ہوئے تقریبا چھہ مہینے ہو گئے۔ چھہ مہیوں میں وقفہ وقفہ سے مسلم تنظیموں نے جملہ بازی کے علاوہ کچھ نہیں کیا ہے۔ جمعہ کے بعد احتجاج کر لینا فرض کی ادائگی تصور کرتے ہیں۔ علماء، ائمہ، مفتی، مفکرین اور جملہ مسلم دانش ور حضرات مل کر ابھی تک اپنا کوئی موقف طئے نہیں کر سکے ہیں۔ ایک بار میں تین طلاق دینے کے متعلق اگر تینوں یا ایک واقع ہوگی ، دونوں طرح کی روایات موجود ہیں،اس کے ساتھ ہی تین طلاق ناجائز و حرام کے سا تھ تین طلاق دینے والے کو کو ڑے کی سزا دی گئی ہے۔ تو کیا پھر سے اس پر غور کر کے کوئی نیا لائحہ تیار کر لینے کی ضرورت نہیں ہے۔ یا کم از کم اگر کسی بھی طرح کی گنجائش باقی نہیں ہے تو ملک بھر کے مفتیان کرام اور علماء و دانشور حضرات نے اس چھہ مہینے کی مدت میں متفق موقف حکومتوں کو پیش کرنے کی کوشش کیوں نہیں کی۔ گر ایک بار میں تین طلا ق کی کثرت ہو رہی ہے اور اس کی وجہ سے معاشرے میں خواتین کو پریشانی کا سامنا کرنا پڑ رہا ہے اور خواتین مجبور ہو کر کورٹ کا دروازہ کھٹکھٹا رہی ہیں تو کیا سوچنے کا مقام نہیں ہے کہ آخر ہم اپنے ہی معاشرے کے مذہبی مسائل کو حل کرنے کے اہل کیوں نہیں ہے۔ طلاق کے علاوہ دیگر کئی معاملات کی اس قدرسنگینی نے ایک بات تو واضح کر دی کہ موجودہ مسلم پرسنل لاء بورڈ اپنی اہلیت کھو چکا ہے۔ اسے ترمیم کرکے اہل ذمہ دار اور فعال لوگوں کو آنے کی ضرورت ہے ورنہ وہ موروثی وراثت کی طرح اس کے عہدے تقسیم ہوتے رہیں گے اور یوں ہی ہر وقفے پر کوئی نہ کوئی تماشہ کھڑا ہوتا رہے گا۔ آخر میں اس سوال پر لوگ احتجاج اور لعن طعن کر کے خاموش ہو جائیں گے کہ آخر کار مولانا اسرار الحق نے پارلیا منٹ میں آواز کیوں نہیں اٹھائی۔ کیا وہ آواز اٹھاتے تو بل رک جاتا ۔ کیا وہ اس پوزیشن میں تھے کہ آواز اٹھاپاتے۔نے جواس پوزیشن میں تھے جیسے کہ جناب اسد الدین اویسی انہوں نے اپنی بات رکھی۔ جو سوال انہیں واجب لگے انہوں نے کئے۔ لیکن اس کے باوجود اس کا حل کیا نکلا۔بدر الدین اجمل کی اپنی پارٹی ہے۔ انہیں بھی بولنا چاہئے تھا ان کی خاموشی مجرمانہ ہے۔
اصل مدعی تو یہ ہے کہ ہمارے پاس جملے بازی کے علاوہ حل کیا ہے۔جمعہ کی نماز کے علاوہ اگر دس بیس پچاس کلومیٹر کے سفر کی دوری پر کوئی بڑا اور ہنگامی احتجاج منعقد بھی کیا جائے تو لوگ کتنے آئیں گے۔ اس جانب قدم اٹھانے والے کو پہلے قسمیں کھانی ہو ں گی کہ آپ ان کا سودا تو نہیں کر دوگے جن کی کوئی قیمت نہیں ہے۔ یا پھرانہیں دوسرے دن انصاف چاہئے۔ پورا ذمہ دار طبقہ کسی نئے داماد کی طرح ناراض ہو جائے گا کہ آخر کوئی اور اس میں پیش پیش کیوں ہے۔موجودہ صورت حال کے لئے ذمہ دار طبقے کا ہر فرد قصور وار ہے جنہوں نے اپنی ذاتی انا کی خاطر اپنی آنکھو ں کے آگے دین کا سودا ہونے دیا۔ خواہ وہ خانقاہ میں بیٹھے پیران عظام ہوں، مدارس کے اساتذہ ہوں، ائمہ و مبلغین ہوں، مقرررین و شاعر ہوں، تبلیغی ہوں یا دعوتی ہوں کیوں کہ انہیں جب خود کیلئے کوئی ضرورت محسوس ہوتی ہے تو کسی نہ کسی طرح دین کی دہائی دے کر اس کاانتظام کر لیتے ہیں۔لیکن دین کے لئے ان کے فلک بوس نعروں اور جادو اور کرامتوں نے کوئی انقلاب برپا نہیں کیا اور نہ زمین آسمان میں کوئی زلزلہ آیا۔
چھہ مہینے پہلے بھی بند کمروں میں یا دوچند لوگوں کے ساتھ نماز جمعہ کے بعد احتجاج کیا تھا آج بھی وہی کر رہے ہیں۔ آج بھی ہمارے پاس کوئی لائحہ عمل نہیں ہے۔ اگر ابھی بل پاس کرانے والی جماعت آکر کہتی ہے کہ چلو اس بل کو منسوخ کرتے ہیں۔ تمہارے اپنے پاس اس متعلق کیا خاکہ و منسوبہ ہے۔ کیا ہم اس جواب کے لئے تیار ہیں؟ آخر دسیوں ممالک نے تین طلاق پر مطلقا پابندی عائد کردی ہے، اور وہ مسلم ممالک ہیں۔پڑوسی ملک پاکستا ن نے بھی ایسا قانون بنایا ہے۔ تو آخرہندوستان میں اسے لاگو کرنے میں کیا حرج ہے؟ کیا ان سوالوں کا کوئی معقول جواب ہمارے پاس ہے؟ اگر ہے، تو اس سے پوری قوم مسلم کے ساتھ حکومتی اور غیر حکومتی اداروں کو آگاہ کیا جائے اور اگر نہیں ہے، تو جملہ بازی کرنے کی بجائے سنجیدگی سے اس پر غور کر لیا جائے۔ یا پھر اس کا تیسرا طریقہ یہ ہے کہ خاموشی اور خوشی سے اس بل کااستقبال کریں۔
ایک آخری امید آل انڈیا علماء و مشائخ بورڈ سے ابھی بھی باقی ہے کیونکہ جب حکومت نے تین طلاق کے خلاف کورٹ میں اپنا حلف نامہ داخل کیا تھا اس وقت بورڈ کے بانی و صدر نے اعلان کیا تھا کہ وہ اس مسئلے کو ملک کے جملہ مقتفدر علماء و مشائخ کے درمیان رکھیں گے اور اس پر ایک متفق رائے بنانے کی کوشش کریں گے۔ ابھی ان کے موقف کا انتظار ہے۔ شاید اس وقت قوم سلم کو سنجیدگی کے ساتھ بیٹھ اس معاملے پر غور کرنا چاہئے۔ بورڈ کو آگے آکر ایک عظیم اور انقلابی اقدام کرنا چاہئے کیونکہ یہ اس وقت قوم کی سب سے بڑی ضرورت ہے۔
Abdul Moid Azhari (Amethi) Contact: 9582859385, Email: abdulmoid07@gmail.com


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Wednesday, January 3, 2018

بی جے پی کی مسلم خواتین پر مہربانیBJP kind on Muslim Women बीजेपी की मुस्लिम महिलाओं पर मेहरबानी


بی جے پی کی مسلم خواتین پر مہربانی
عبد المعید ازہری

مسلم خواتین کی نمائندہ سیاسی پارٹی بی جے پی نے آخر کار اپنی سیاسی منشا کی تکمیل کی اور طلاق ثلاثہ کے مخالف بل کو لوک سبھا میں پیش بھی کر دیا اور اپنی حامی جماعتوں کی تائید حاصل کرتے ہوئے اسے پاس بھی کر دیا۔ بڑی حریف جماعتوں نے زیادہ مخالفت کی کوشش نہیں کی۔ کچھ نے ہمت نہیں دکھائی شاید باقی نہیں رہی اور کچھ نے احسان کا بدلہ چکا دیا۔میڈیا اپنا کام بڑی ایمانداری سے کر رہی ہے۔ ملک کے کونے کونے سے مظلوم خواتین کی فہرست تیار کر رہی ہے اور انہیں ٹی وی کیمرا کے سامنے لا کر ان کے حق میں کئے گئے انصاف کی چرچا کرنے میں مصروف ہے۔مسلم حلقوں میں کچھ بے مطلب کی سی بے چینی ہے۔ کچھ زبانی مظاہرے ہیں جو دو چند روز میں سر د ہو جائیں کے۔ وہ معزور بھی ہو سکتے ہیں یا ان کی اپنی کوئی مجوری بھی ہو سکتی ہے۔کچھ دانش وروں نے سوال اٹھائے ہیں ۔ بڑی باریکی سے طلاق ثلاثہ کے متعلق پاس کئے گئے بل کو دیکھا اور اس پر غور کیا اور چند غور طلب پہلؤں کو اجاگر کیا۔ بند کمروں میں ان کا اظہار جاری ہے۔ سوشل میڈیا پر احتجاج اور تائید مسلسل جاری ہے۔ اس وہم محض کے ساتھ کہ ہم اس سوشل میڈیا کے توسط سے جنگ جیت لیں گے۔ٹی وی پر بحث کا موضوع آج کل کافی ٹی آر پی بڑھا رہا ہے۔ مسلمانوں کی نمائندگی کرنے والے علماء اور سیاسی قائدین کی جنگ بھی جاری ہے۔ یہ بھی شاید سچ ہے کہ وہ کر ہی کیا سکتے ہیں۔ کم از کم اسی بہانے ٹی وی کے ذریعے اس سوئی ہوئی غافل قوم کے اندر ان کی اپنی ساخت بن جائے گی کہ انہوں نے قوم کے حق میں ٹی وی چینلوں پر کتنے ہی بحث کر ڈالے۔
اخباروں، ٹی وی چینلوں اور سوشل میڈیاکے ذریعے ملی خبروں کے مطابق بل میں کچھ کمی رہ گئی ہے یا کر دی گئی ہے۔ سوال یہ ہے کہ مسلم خواتین کے حقوق کی لڑائی لڑنے والی بی جے پی نے آخر ملک کے اتنے سنگین مسائل مثلا، بے روزگاری، عام خواتین کی عصمت دری، کسانوں کی خودکشی،فرقہ پرست طاقتوں کی آئین دشمنی کو چھوڑ کر آخر مسلم خواتین کے ذاتی و مذہبی مسئلے میں دلچسپی لینے کے پیچھے کیا وجہ ہو سکتی ہے۔ حالانکہ ملک کے مکھیا ہونے کے ناطے کسی بھی وزیر اعظم کی یہ ذمہ داری ہے کہ ملک کے ہر باشندے کا خیال رکھے اس کے تحفظ اور حقوق کی ادائگی کے ساتھ اس کے ساتھ انصاف اور برابری کے سلوک کو یقینی بنائے۔اس لحاظ سے وزیر اعظم کا شکریہ ادا کرنا چاہئے کہ انہوں نے اپنی ذمہ داری کا احساس کرتے ہوئے مسلم خواتین کے تئیں اقدام کی فکر کی۔ لیکن اس اقدام میں خود آئین کی بھی خلاف ورزی ہو رہی ہے کہ کیونکہ ملک کا آئیں کسی بھی شخص کو اس کی مذہبی آزادی دیتا ہے۔ اس بل کے مطابق اگر کسی نے اپنی بیوی کو ایک بار میں تین طلاق دے دیا تو اسے تین سال کی سزا ہوگی۔ اس کے ساتھ ہی تین طلاق واقع بھی نہیں ہوں گی۔ وہ ایک ہی مانی جائے گی۔ اب یہاں سوال یہ ہے کہ اگر طلاق واقع ہی نہیں ہوئی تو سزا کس بات کی دی جائے گی۔ شیعہ اور اہل حدیث کے یہاں پہلے سے ہی یہ نظام ہے کہ تین ہو یا تین سو یا اس بھی مزید چاہے جتنی طلاقیں دی جائیں ایک بار میں صرف ایک طلاق ہی وقع ہوگی۔ تو ایسے میں کوئی قانون یا بل لانے کی کیا ضرورت تھی۔
تین طلاق کے بعد بھی وہ بیوی ہی رہے گی یہ الگ بات ہے۔ طلاق دینے والا جیل بھی جائے گا اور بیوی اور بچوں کا خرچ بھی اٹھائے گا۔تین طلاق کے ثبوت کا حق بھی عورت کو ہوگا۔ جیسے کہ جہیز کے خلاف عورت کو خصوصی اور رعائتی حق حاصل ہے۔ اگر کسی عورت نے اپنے شوہر کے خلاف جہیز کا کیس درج کرا دیا تو شوہر سے پوچھے بغیر اور اس سے اس بابت کوئی بھی سوال جواب کئے بغیر اسے پہلے جیل میں بھیجا جائے گا اس کے بعد ہی کوئی پوچھ تاچھ کی کارروائی ہوگی۔ اب اس معاملے میں آج کے حالات کیا ہیں سب کے سامنے ہیں۔
جب سے یہ طلاق کا مدعیٰ اٹھا ہے تب سے ایک بات بڑے تسلسل کے ساتھ چل رہی ہے۔ سیاسی جماعتوں ، ان کے نمائندوں اور ٹی وی چینلوں کے ساتھ اخبار والوں نے اب تک کسی طلاق دینے والے کو بلا کر اس سے اس کے طلاق دینے کی وجہ نہیں پوچھی۔ جن خواتین کو میڈیا کے سامنے پیش کیا گیا ان کے ساتھ ہونے والی ناانصافی کو تو دکھایا گیا لیکن کس نے کیوں ایسا کیا اس معاملے تک پہنچنے کی کوشش نہیں کی گئی۔ اب تک جن خواتین نے اس معاملے میں اگوائی کی ہے ان میں سے اکثر کا کسی بھی گروہ میں یقین ہونا یقینی نہیں ہے۔ سرے سے وہ کسی نظام کو نہیں مانتی تو ان کے لئے ایک، دو یا تین طلاق کوئی معنیٰ نہیں رکھتا۔اس معاملے میں شروع سے ایسے کردار گڑھے گئے ہیں کہ معاملہ کو اتنا پیچیدہ بنا دیا جائے کہ اس کے بارے میں کچھ کہنے اور بولنے سے پہلے لوگ پس وپیش کا شکار ہو جائیں۔
طلاق ثلاثہ، لو جہاد اور گؤ رکشا کے مدعوں سے اپنی سیاسی ناکامی پر پردہ ڈالا گیا تھا وہ آج تک بدستور جاری ہے۔ترقی اور روزگار کی ناکامی اور نوٹ بندی اور جی ایس ٹی کی نااہلی کی پردہ پوشی کے لئے یہ مذہبی کارڈ انتخاب کے دنوں سے لے کر اب تک چل رہا ہے۔اس کارڈ کو مسلمانوں نے ہی آسان کر دیا ہے۔ابھی حال ہی میں ملک کے سب سے بڑے گھوٹالے 2Gکے بارے میں کورٹ کا ایک فیصلہ آیا اور کئی ملزمین کے اوپر سے الزام ہٹایا گیا اور سبھی کو بے گناہ قرار دیا گیا۔حالانکہ اس گھوٹالے کے بارے میں انکشاف کرنے والی ایسی ایجنسیا بھی ہیں جو ملک میں اساس کا درجہ رکھتی ہیں۔اب ان کا بھی یقین داؤں پر لگ گیا ہے۔ حالانکہ جس طرح بی جے پی حکومت کی دیکھ ریکھ میں یہ اے راجہ کے علاوہ دیگر ملزمین کو ایک عرصے کے بعد انصاف ملا اسی طرح اگر چہ کانگریس بی جے سے ناراض اور اس کی سخت مخالف ہو اس کے باوجوس لوک سبھا میں اس نے بی جے پی کی جانب سے طلاق ثلاثہ سے متعلق بل کی زیادہ مخالفت نہیں کی کیونکہ اسے بھی لگا یہ بل درست ہے۔
یوپی کی بی جے پی حکومت نے جب اپنا تعلیمی بل پیش کیا تو اس میں لوگوں نے حکومت کی قابلیت اور اہلیت کو پہچان لیا اور ہر طرف سے لوگ اس کے متعلق بحث اور چرچہ کرنے لگے۔ حکومت کو لگا کہ اس کی پالیسی کی کافی چرچہ ہو رہی ہے اس لئے اس نے موضوع بدلنے کے لئے گو کشی کو بند کرنے کا اہم اعلان کیا اور کیونکہ یو پی کی ترقی کا سب سے بڑا روڑا یہی تھا۔ غیر قانونی بوچڑ خانوں کو آن کی آن میں بند کر دیا گیااور ریاست ترقی کی راہوں پر چل پڑا۔ رہی سہی کسر لو جہاد اور گو رکشک دلوں نے پوری کر دی۔ چونکہ حکومت انصاف نہیں کر پا رہی تھی۔ اس لئے ان لوگوں کو قانون ہاتھ میں لینا پڑا اور ملک کے کونے کونے میں انہوں نے حکومت کی پشت پناہی میں انصاف خانے کھول دئے۔ 
امید ہے ایسا ہی چلتا رہے گا۔ ایک دن آئے گا جب ریاستوں کو حکومت کی ضرورت ہی نہیں پڑے گی۔
Abdul Moid Azhari (Amethi) Emai: abdulmlid07@gmail.com, Contact: 9582859385


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Monday, January 30, 2017

امیٹھی کے گنہ گار کون ؟ अमेठी के गुनाह गार कौन ?


امیٹھی کے گنہ گار کون ؟
عبد المعید ازہری

دہلی کے بعدیو پی، ہندوستانی سیاست کا دل کہا جاتا ہے۔ اس کا اندازہ موجودہ سماجوادی پارٹی کے گھریلو دنگل اور بی جے پی کے ایڑی چوٹی کے زور سے بھی لگایا جا سکتا ہے۔ یو پی کسی کے بھی سیاسی اقتدار کا فیصلہ کرتا رہا ہے۔ یو پی کا سکندر پورے ملک پر راج کرتا ہے۔ یوں ہی، یو پی کی سیاست امیٹھی سے طے ہوتی ہے۔ بالخصوص کانگریس کی سیاست کا مخرج و مرجع دونوں ہی امیٹھی ہے۔ کانگریس کی بڑی لیڈر شپ اسی زمین کی سیاسی تربیت یافتہ ہے۔ امیٹھی کانگریس کی سیاست کا اٹوٹ حصّہ تھا ہے اور رہے گا. بلکہ پچھلے اسمبلی انتخابات نے یہ بات ثابت کردی ہے کہ امیٹھی کانگریس کی یو پی سیاست کا دل ہے اور وہیں سے اسے ہمت بھروسہ اور طاقت ملتی ہے. یہی وجہ ہے کہ ہر بڑی سیاسی گفتگو امیٹھی کا ذکر کئے بغیر مکمل نہیں ہوتی. یو پی کی سیاست بالخصوص امیٹھی اور رائے بریلی کی سیاست لوہے کے چنے چبانے کی مانند ہے۔ یہ الگ بات ہے کہ اب امیٹھی اور رائے بریلی کو بھی لگنے لگا ہے کہ ان کی سیاسی قسمت کا فیصلہ دہلی سے ہوتا ہے۔
بی جے پی کی اسمرتی ایرانی کو جب امیٹھی میں لانچ کیا گیا تھا اور انھیں کانگریس کے شہزادے راہل گاندھی کے مقابلے اسمبلی انتخاب لڑانے کا فیصلہ لیا گیا تو امیٹھی کی تاریخ کو خوب کھودا گیا تھا۔ اس تاریخی کارنامے میں عام آدمی پارٹی سے امیٹھی میں پہلی بار اسمبلی انتخاب کے امیدوار کمار وشواس کا بھی بڑا اہم کردار رہا ہے۔ دونوں ہی نے مل امیٹھی کے لوگوں میں ایک ایسے خوابیدہ امیدیں جگا دی تھیں کہ ایک وقت ایسا لگ رہا تھا کہ امیٹھی کا ہر بندہ اپنے آپ کو ٹھگا ہوا محسوس کر رہا تھا۔ کبھی کمار وشواس تو کبھی اسمرتی ایرانی میں اپنا نیا رہنما دیکھنے لگے تھے۔ ان کی تقریریں سننے کیلئے بڑا ہجوم اکٹھا ہوتا تھا۔ اسی اثناء میں سماج وادی نے بھی ایک نئے شہزادے کو عوام کے سپرد کر دیا۔ اس شہزادے کی محنت اور جذبے نے باقی کو پھیکا ثابت کر دیا۔ جس کی بدولت یو پی کی وزارت اعلی کی گدی ملی۔ حالیہ گھریلو دنگل سے پرے اگر انکی پانچ سال کی کارکردگی کا غیر متعصبانہ جائزہ لیا جائے تو اکثر کا یہی کہنا ہے کہ عین ممکن تھا کہ اکھلیش حکومت پھر سے یو پی میں اقتدار حاصل کرتی۔
اس سیاسی رہنمائی اور وعدہ گوئی کے پس منظر میں ایک دردناک، ہیبت ناک اور نہایت ہی ڈراؤنا اور گھناؤنا حادثہ ابھی حال ہی میں امیٹھی کے مہونا علاقے میں ہوا۔ ایک ہی خاندان کے11 افرادکونہایت ہی بیدردی، بیرحمی اور حیوانی و شیطانی طریقے سے قتل کر دیا گیا۔ مقتولین میں عورتیں بچے اور جوان سبھی شامل ہیں۔ سب کا گلا تیز اوزار سے کاٹا گیا ہے۔ ان میں سے ایک کو مار کر گلے میں پھندا لگا کر چھت سے لٹکا دیا گیا تھا۔ اس گھر کی ایک اکیلی عورت اور ایک لڑکی جو اس رات اسی گھر میں سوئی تھی، بچی ہوئی ہے جو زخمی ہے اور اسپتال میں داخل علاج ہے۔پورے علاقے میں وحشت و دہشت کا ماحول ہے۔ کوئی بھی یقینی معلومات نہ ہونے کی وجہ سے طرح طرح کی چہ می گوئیاں کی جا رہی ہیں۔ عجیب طرح کی اٹکل بازیوں کا بازار گرم ہے۔ ڈر کے ساتھ حیرت و استجاب میں روزانہ اضافہ ہوتا جا رہا ہے۔ غم و غصہ کا اظہار بھی کہیں کہیں ہو رہا۔ کچھ اندازہ بازیوں سے جذبات مجروح ہونے کی بنا پر تشدد بھی ہو رہا ہے۔
یہ واقعہ مہونا گاؤں کے جمال الدین اور اس کے خاندان کا ہے۔جمال الدین (جمالو)مہونا کے ایک چھوٹے سے گاؤں پورے بہول کا باشندہ تھا۔ مہونا خاص میں اس کی بیٹری اور رسوئی گیس کی دوکان تھی۔ جسے وہ خود اور اس کے دو لڑکے چلاتے تھے۔گھر میں عورتیں مقامی بچوں کو پڑھاتی بھی تھیں۔ یہ ایک عام بات ہے۔ اکثر جو عورتیں عربی پڑھے ہوئے ہوتی ہیں وہ مقامی بچوں کو خاص طور پر بچیوں کو مفت تعلیم دیتی ہیں۔ جس رات قتل ہوا اس کی صبح گاؤں کے کچھ بچے جب جمالو کے گھر پر پڑھنے کیلئے آئے تو پتہ چلا کہ پورا گھر موت کی نیند سو رہا ہے۔گھر کے 11افراد کی رات آخری رات ہوگئی تھی۔ وہ بھی نہایت ہی دردناک اور ہیبت ناک رات۔
مقامی پولیس کے مطابق اس پورے قتل کا ذمہ دار خاندان کا مکھیا خود جمال الدین ہے۔ پولس کی طرف سے دئے گئے بیان کے مطابق جمال الدین نے غریبی سے تنگ آ کر خود ہی اپنے پورے خاندان کو قتل کرنے کی بڑی سازش رچی تھی۔ پہلے اس نے گھر کی تمام عورتوں کو نشہ آور دوا پلایا۔ اس کے بعد یکے بعد دیگرے خاندان کے جملہ افراد کو قتل کیا۔پھر خود کو پھانسی لگا لی۔ مقتولین میں اس کی تین بیٹیاں، بھائی کی بیوہ، اس کی تین بیٹیاں، انکے ایک گمشدہ بھائی کی بیوی، اور اس کی دو بیٹیاں شامل ہیں۔ جمال الدین اور اس کی ایک بیٹی بچ گئی تھی کیونکہ وہ کمرہ بند کر کے سوئی تھیں۔ اس کے دہ بیٹے بھی بچ گئے ہیں۔ کیوں کہ وہ دوکان میں سوئے ہوئے تھے۔ پولیس کے مطابق اس بات کی جانکاری خود جمال الدین کی پچیس سال کے بیٹی نے ہوش میں آنے کے بعد دی ہے۔
پولیس کے اس بیان پر کوئی بھی یقین کرنے کو تیار نہیں۔ اس بڑے پیمانے پر بہیمانہ قتل کی چھوٹی یا بڑی تفتیش کے بغیر پولیس اور میڈیا کا یہ بیان نہایت ہی تکلف دہ ہے۔
ویسے جمال الدین کے گھر دیر رات آئی ایک کار، بجلی ہونے کے باوجود جنریٹر چلانے کی ضرورت، خود جمال الدین اگر قاتل ہے تو اس کے جسم پر ایک بھی خون کے دھبے نہ ہونا، گھر کے پیچھے خون میں سنے ہوئے جوتوں کا ملنا، چھٹ سے لٹکنے کیلئے نیچے کسی بھی ٹیبل یا اونچی چیز کا نہ ہونا، پھندے پر لٹکے ہوئے جمال الدین کے پیر سے چپل تک نہ گرنا جیسی کیفیات کچھ اور ہی بیان کر رہی ہیں۔
گاؤں کے پردھان اور دیگر لوگن کے مطابق جمال الدین نہایت ہی سلجھا ہوا، سیدھا اور خاندان کا خیال رکھنے والا شخص تھا۔ وو اتنا غریب بھی نہیں تھا کہ فاقہ کشی اور مفلسی کے چلتے اتنے لوگوں کی جان لے لے۔ کچھ اور بھی بڑے سوال ہیں جن کا جواب اب تک لوگوں کو نہیں ملا ہے۔ جیسے اگر جمال الدین کی گھر کے سبھی افراد کو مارنا ہی تھا اور اس نے نشے کی دوا بھی پلائی تھی تو اس نے زہر کا استمعال کیوں نہیں کیا؟ اس کے علاوہ گھر سے کسی بھی طرح کی دوا ،شیشی،ٹیبلٹ یا اس کے کچھ نشان ملنے کی کوئی خبر نہیں۔ اتنے لوگوں کا قتل ہوا اور اس کی اتنی بڑی سازش رچی گئی لیکن گاؤں کیا پڑوسی کو بھی کانوں کا خبر نہیں ہوئی۔ گھر کے کسی بھی فرد نے نوٹس نہیں دیا۔ جمال الدین نے اکیلے اتنے بڑے حادثے کو انجام دیاتو اس کی تیاری بھی کی ہوگی۔ لیکن کسی کہ ذرا سا بھی شک نہیں ہوا۔ اگر فاقہ کشی سے یہ واقعہ انجام دیا گیا ہے تو جمالو پر اس کے اثرات اس سے پہلے بھی آئے ہوں گے۔ لیکن کسی نے اس بات شکایت نہیں کی۔ کوئی چیکھنے چلانے کی بھی آواز نہیں آئی۔ جمال الدین کے اوپر بھائی کی بیوہ کو بھی قتل کا الزام ہے۔ جمالو کی جسمانی حالات دیکھ کر ایسا نہیں لگتا کہ وہ ایسا کر پائے گا۔ مقامی لو گوں کے مطابق گھر سے کچھ کاغذات ملے ہیں جس کے بارے میں پولیس چھپا رہی ہے۔ ایسے بہت سے سوالات ہیں جن کے جواب سبھی کو چاہئے۔ سب سے بڑی بات یہ ہے کہ اتنے لوگوں کا قتل ہوا لیکن کسی نے بھی مزاحمت نہیں کی۔ اپنے آپ کو بچانے کی کوشش نہیں کی۔ سب ایک ہی جگہ بالکل ایک دوسرے سے ملے ہوئے سو رہے تھے۔ لاشیں بھی بالکل ویسے ہی ملی ہیں۔
پولیس اور میڈیا کا قبل از وقت اور بنا تفتیش کے خود مقتول جمال الدین کو ہی مورد الزام ٹھہرانا خود میں ایک سوال ہے۔ پورے علاقے میں بڑے پیمانے پر غم و غصہ کا ماحول ہے۔ امیٹھی کو اپنا گھر کہنے والے ، پورے ملک میں گھوم گھوم کر چارپائی پر چرچہ کرنے والے امیٹھی سے موجودہ ممبر پارلیامنٹ اور کانگریس کی جنرل سیکرٹری راہول گاندھی سے لوگ سوال کر رہے ہیں کہ اتنا بڑا حادثہ ہو گیا اور ابھی تک اس کی کوئی حال خبر نہیں لی گئی۔ نہ ہی دیکھنے آئے، نہ کسی کو بھیجا نہ ہی کوئی بیان دیا۔ امیٹھی گاؤں میں کسی کے گھر پر ڈال چاول کھانے کی سیاست کرنے والے کو آج اپنے علاقے کی خبر گیری کی فرصت نہیں ہے۔ امیٹھی میں اپنے خاندان کی خدمات کی یاد دہانی کرا کر امیٹھی کی عوام کو جذبانی بنانے والی پرینکا گاندھی بھی خاموش ہیں۔ انتخاب کے دوران امیٹھی کی تاریخ بدلنے کا دعوی کرنے والی اسمرتی ایرانی کی بھی زبان نہیں کھل رہی۔ کمار وشواس کا طنز اور ان کی تنقیدی شاعری بھی سو رہی ہے۔ اپنے آپ کو دلتوں کا مسیحا کہنے والی مایا اور مسلم کے ہمدرد ملایم سبھی خواب استراحت میں ہیں۔ کیونکہ یہ معاملہ ایک عام آدمی ہے۔ اپنے وزیر کی بھینس کو بھی کھوجنے کیلئے پولیس تعینات کرنے والی یو پی حکومت نے بھی کان بند کر رکھے ہیں۔ لمبی ٹوپی، سعودی رومال اور سفید کرتا پہن کر مسلمانوں کی ہمدردی حاصل کرنے والے یو پی کے مکھیا اکھلیش بھی آج چپ ہیں۔ اتنے بڑے حادثے کو کوئی اہمیت نہیں۔ اس کے بر عکس پولیس اور میڈیا اپنے اپنے اندازے سے فیصلہ سنانے کی روایت پر عمل کر رہے ہیں۔
ابھی کچھ ہی مہینہ قبل یو پی ہی کے بدایوں کا ایک نجیب JNUسے دین دہاڑے غایب کر دیا جاتا ہے۔ پولیس کو اب تک کوئی سراغ نہیں ملا۔ ایک ہی گھر کے 11لوگوں کا قتل ہو گیا پولیس کو ابھی بھی کچھ معلوم نہیں۔ دونوں ہی کیسوں میں خود مظلوموں ہی کو مورد الزام ٹھہرانے کی بے شرمی کا مظاہرہ کیا گیا تھا۔
یہ ہمارے موجودہ دور کی سیاست ہے اور یہی ہمارے ملک کی ترقی کی راہ بھی ہے۔ یہ سوال ہر ہندوستانی سے ہے۔ کیا یہی خواب تھا ملک کیلئے جان دینے والے مجاہدوں کا؟ کیا یسی لئے ماؤں نے اپنی کوھیوں سونی کرلی تھیں؟ عورتوں نے چوڑیاں پھوڑی تھیں؟ بزرگوں نے اپنے سہارے لٹا دئے تھے؟ تاکہ آنے والا وقت انصاف کا ہو آزادی کا ہو۔کیا اب بھی ہم نہیں جاگیں گے؟ ایک ذمہ دار شہری ہم کب بنیں گے؟ آنے والے انتخابات میں یا عام آدمی کی موتوں کا کوئی اثر ہوگا؟یہ سوال امیٹھی کے ہر انسان کا ہے ۔ امیٹھی کا گنہ گار کون ہے؟
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Abdul Moid Azhari (Amethi) E-Mail: abdulmoid07@gmail.com, Contact:9582859385