Showing posts with label India My Country. Show all posts
Showing posts with label India My Country. Show all posts

Sunday, April 15, 2018

धर्म स्थल की पवित्रता और देश का गौरव दांव पर holiness of sacred places and pride of the nation are on risk

धर्म स्थल की पवित्रता और देश का गौरव दांव पर
[अब्दुल मोईद अज़हरी]

आसिफा मैं भूल जाना चाहता हूँ कि तुम्हारा मज़हब क्या है, और मुझे यह भी जानने की ज़रूरत नहीं है कि तुम्हारी बिरादरी क्या है. या इलाक़ा कौन सा है. पर यह कैसे भूल जाऊं कि तुम इस देश की बेटी हो. हमारा गौरव, मान, मर्यादा और सम्मान हो. मैं यह भी भूलना चाहता हूँ कि बलात्कारियों का धर्म, समुदाय, या ठिकाना क्या है लेकिन यह कैसे भूल जाऊं कि उन्होंने दुनिया का सब से घिनौना पाप करने के लिए धार्मिक स्थल को अपवित्र किया है. आसिफ़ा तुम अकेली नहीं हो, निर्भया का परिवार हर रोज़ बढ़ता जा रहा है. परिवार से जुड़ता हर सदस्य धर्म के ढोंगी ठेकेदारों, देश और धरती का सौदा करने वाले कुकर्मी राजनैतिक नेताओं, लम्बी लम्बी बातें और भाषण झाड़ने वाले समाज सुधारकों और जज़्बात, दर्द, मुरव्वत और रिश्तों के एहसास से ख़ाली हज़ारों सादे पन्नों पर प्रदर्शनी की काली स्याही पोत कर दुनिया को झूटी तसल्ली देने वाले आराम पसंद लेखकों के मुंह और ज़मीर पर रोज़ तमाचा मारता है. लेकिन दिल पत्थर और आँखों में बेशर्मी के परदे पड़े होने की वजह से कोई असर नहीं हो रहा है. उन्हें इंतज़ार है उस घड़ी का जब घर के कोने की आग दूसरे कोने तक पहुँच कर हजारों घरों को जलाने के बाद उस आग की लपटें जब उन के घर की तरफ बढ़ने लगेंगी तो उन्हें क़ानून, समाज और इंसाफ नज़र आयेगा. उन्नाव की पीड़ित एक और निर्भया हो या बिहार की मज़लूम बेटी हो, सभी का जुर्म यह है कि वह इस देश की बेटियां हैं.
आज जिस तरह से कानून व्यवस्था जुर्म और ताक़त के बाज़ार में नाचने का काम कर रही है निंदनीय और अफ़सोस नाक है. कठुवा में जिस तरह से क़ानून के काले सफ़ेद मिटटी (ख़ाकी) के हाथों ने शर्मनाक प्रदर्शन किया है वह ख़ुद के क़ानून परिवार के सदस्यों के ज़मीर और आत्मा पर ज़ोरदार दहशत का तमाचा है. उन्नाव और कठुआ में दर अस्ल सिर्फ देश की उस बेटी का बलात्कार नहीं हुआ है बल्कि क़ानून व्यवस्था, शासन, प्रशासन के साथ अब तक चुप रह कर तमाशा देखने वाले पूरे समाज के साथ रेप हुआ है. कठुआ के खाना बदोश की आठ साला बेटी के साथ जानवरों से भी बुरा बर्ताव होता है वह भी इस लिए कि उन खाना बदोशों को वहां से डरा धमका कर भगा दिया जाये. किसी को भगाने का यह अद्भुत और मानवहीन तरीका बड़ा निर्दयी है. हमें यह सवाल बुरी तरह परेशान करता है कि यह भगाने की सियासत के चक्कर में हैवानों वाला प्रदर्शन कब तक चलेगा. उस के बाद जब मुजरिमों पर कानूनी कार्रवाई की कोई प्रतिक्रिया शुरू होना चाहती है तो उन के बचाव में उतरने वाले लोगों को देख तो देश का सिर झुक गया.
जिस देश की धरती को माँ कहा जाता हो, वहां की बेटियों को देवी का रूप समझा जाता हो. मात्र भूमि की जय कार होती है. वहीँ पर माँ और बेटी दोनों का अपमान, उन का शोषण और उन का बलात्कार क्या देश के साथ दुर्व्यवहार नहीं है. बलात्कारियों और दंगाइयों के समर्थन में भारत माता की जय और जय श्री राम के नारों का प्रयोग कर के ना सिर्फ भारत माँ के पावन चरित्र पर कीचड़ उछाला है बल्कि मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम का भी अपमान किया है. जिस की मर्यादा और पुरुष की उत्तमता की गाथाएं पुराणों और धार्मिक संवादों में बड़ी आस्था के साथ बयान की जाती हो उस के नाम का इस्तेमाल उसी के विचारों और शिक्षा के विरुद्ध होना उस का अपमान है.
जहाँ एक गिरोह नारा ए तकबीर की आवाज़ लगा कर ख़ुद को बम से उड़ा कर निर्दोषों की हत्या का बड़ा गुनाह करता हैं वहीँ यह गिरोह भी श्री राम और भारत माता के नारे लगा कर ज़ुल्म और पाप करते हैं. दोनों में कोई फर्क नहीं है. आज नारों का राजनैतिक दुरूपयोग दुर्भाग्य पूर्ण है. कठुआ के बलात्कारी हों, उन्नाव के ज़ालिम या बिहार का वहशी दरिंदा जिस ने 6 साल की मासूम पर अपनी नामर्दी और नपुंसकता दिखाने का दुस्साहस किया.
यह इस कायर पुरुष प्रधान की मानसिकता है कि अपनी नाकामी छुपाने के लिए हर शहर और गाँव में एक निर्भया का उदाहरण दे कर उन्हें अपने पाँव की जूतियाँ बनाना चाहते हैं. लेकिन यह भारतीय बेटियों का साहस है कि इन्हीं जंगलों से निकल कर वह देश का गौरव बन कर स्वर्ण पदक का कीर्तिमान रच का भारत माँ का शीश गर्व से ऊँचा कर रही हैं.
ऐ भारत की बेटियों तुम रुकना नहीं. यह तुम्हारे हौसले की जीत है. निर्भया और आसिफा जैसी देश की धरोहरों का बलिदान है. यह मुट्ठी भर कायरों और बीमारों का समाज तुम्हारे हौसलों को पस्त नहीं कर सकता.
आज बलात्कार की बढती घटनाओं से क़ानून और समाज दोनों ही हारा है. यह इतिहास रहा है कि जब कभी भी पूंजीपतियों ने क़ानून को अपनी जेब का ग़ुलाम बनाने की कोशिश की है. जनता की अदालत ने इस देश और न्याय व्यवस्था की रक्षा की है.
अभी भी देश का बहु संख्यक समाज इस हीन भावना का विरोधी है. वह उठेगा एक दिन और फिर हर बेटी को इंसाफ मिलेगा. यह बेटियां ही उठाएंगी उन्हें. जब अपने बलात्कारी बाप, भाई और बेटे का बहिष्कार करेंगी. अपने सारे रिश्ते ख़त्म कर देंगी. और हर पुरुष को महिलाओं के सम्मान के लिए मजबूर कर देंगी. क़ानून व्यवस्था को भी एक दिन आज़ादी मिलेगी. यह सब कुछ होगा. जब लोगों का धर्म उनकी निजी आस्था और देश, समाज और मानवता उन की सामूहिक पहचान होगी.
रावण और शैतान कहीं अलग नहीं है. वह हमारे बीच और अपने अन्दर ही है. वरना रावण के चंगुल में क़ैद सीता जी की अस्मिता सुरक्षित रही लेकिन आज भक्तों और जिहादियों के हाथों में कुछ भी सुरक्षित नहीं है.
किसी भी नाकामी को बलात्कार से नहीं छुपाया जा सकता. क्युकी कभी कभी रोष में की गई प्रतिक्रिया प्रतिशोध बन कर बहुत कुछ जला देती है जिस की चिंगारियां सदियों तक दर्द हाँ एहसास दिलाती रहती हैं. खुद भी बचो और देश को भी किसी ऐसी आग में जलने से बचा लो.
Abdul Moid Azhari (Amethi) Email: abdulmoid07@gmail.com, Contact: 9582859385


Tuesday, September 26, 2017

برما کی آگ اور ہمارے ملک کی سیاست،خدا خیر کرے!बर्मा की आग और हमारे देश की राजनीति! खुदा खैर करे Burma & our Politics! God save us all!


برما کی آگ اور ہمارے ملک کی سیاست،خدا خیر کرے!

عبد المعید ازہری

دن ڈھل چکا تھا۔ میں دفتر سے گھر کی طرف واپس آ رہا تھا۔سورج غروب ہو نے کے بعد شفق کی آخری مدھم سی روشنی بکھری ہوئی تھی۔ میں اتنا تھکا ہوا تھا کہ کہیں دور کا شور، چیخ اور آہ فریاد کی صدائیں بھی سن کے کچھ بھی سمجھنے سے قاصر تھا۔جیسے جیسے میں گھر کے قریب ہو رہا تھا آواز بلند ہو رہی تھی۔ قریب کی بستی سے اٹھتا دھواں اور اس میں جلنے کی عجیب سی بدبو سے طبیعت مضطرب ہونے لگی تھی۔ ایک وقت تو ایسا بھی لگا شاید پڑوس ہی میں کہیں آگ لگی ہو۔ اچانک سے میری دل کی دھڑکنین تیز ہو گئیں۔ پچھلے 20دنوں کے منظر ایک ایک کر کے سامنے آنے لگے۔یہ اور بات ہے کہ اکثر حادثات کی منظر کشی موبائل سے ہوئی تھی۔ سوشل میڈیا کے ذریعے آئی لوٹ مار اور قتل و غارت گری نے ایک سے زائد بار جذباتی بنا کر ہلاکت میں اضافہ کر چکے تھے۔ اس کے بعد اس میڈیا نے آج ہمیں اتنا ہراساں کر دیا ہے کہ میں اپنی موت کا انتظار کر رہا ہوں۔اب تک نذر آتش ہونے والے محلوں ، قصبات اور علاقوں کی تعداد بیس سے اوپر ہو چکی ہے۔ یہ وہ فہرست ہے جو اس بار کی قیامت کے ہیں۔ اس سے پہلے کی قیامت کو ہم بھول چکے ہیں۔ان جلی ہوئی بستیوں میں بچوں کے سلگتے جسم، برہنہ عورتوں کے لہولہان بدن، مردوں کے کٹے ہوئے اعضاء اور بزرگوں کا خاک و خون میں مٹتا وجود ہے۔وہ منظر بھی خون بن کر آنکھوں سے بہنے لگا جب ہتھیار بند جتھا قریب کی بستی میں گھسا تھا۔گھر کو بند کر کے اس میں آگ لگا دی گئی۔ زندہ انسان چیختے رہے۔ آگ کے شعلے ان کی چیخوں سے اور بھڑکتے رہے۔جس نے گھر سے بھاگنے کی کوشش کی اسے واپس کاٹ کر اس میں پھینک دیا گیا۔اب میں سمچھ گیا تھا کہ اب تک میں جس حادثے کا انتظار کر رہا تھا شاید وہ وقت قریب آگیا ہے۔ہمت جواب دے چکی تھی۔ہاتھ پاؤں شل ہو گئے تھے۔ایسا لگا سامنے سے بھڑکتے ہوئے شعلے میری طرف لپک رہے ہیں۔ ان شعلوں کے درمیان برچھیاں تلوارویں اور ترشول نظر آرہے تھے۔ ایک سرد سی لہر پورے وجود میں کسی بجلی کی مانند کوند گئی۔ لڑکھڑاکر شاہراہ سے نیچے گر گیا۔
ارد گرد کالی رات کے کسی سنسان علاقے کی مانند خاموش سناٹا تھا۔ پرندوں کی چہچہاہٹ اور کتوں کے بھونکنے کی آوازیں شور کر رہی تھیں۔ انسانی لاشوں کے جلنے کی وجہ سے پوری فضاآلودہ اور پراگندہ ہو چکی تھی۔ صبح نمودار ہونے کو تھی۔پورا جسم کمزرو لگ رہا تھا۔ذرا ساآنکھ کھولنے کی ہمت کی تو ایک بزرگ بغل والی درخت سے ٹیک لگائے ملے۔ ان آنکھوں کے اشک خوشک ہوچکے تھے۔ پتلیوں میں ویرانی صاف جھلک رہی تھی۔میں نے نڈھال سی آواز میں کہادادا یہ سب کیا ہو رہا؟ یہ لوگ ہمارے اور ہمارے مذہب کے پیچھے کیوں پڑے ہوئے ہیں؟ کیا اب سمجھ لیا جائے کہ مسلمانوں کے جینے کاحق نہیں ہے؟یہ بدھسٹ مسلمانوں کے دشمن نہیں کیوں ہیں؟ آخرم ہم نے کیا بگاڑا ہے؟ ہمارا جرم کیا ہے؟ بزرگ کی بیزار آنکھیں یک لخت میری طرف اٹھیں اور کچھ کہتے کہتے رک گئیں۔میرے بارہا جھنجھلاتے ہوئے سوال سے تنک آکر انہوں نے کہا۔یہ بدھسٹ نہیں ہیں۔ میں سنبھل کر بیٹھ گیا۔میں کچھ جواب دینے ہی والا تھا کہ انہوں نے کہا کہ یہ سب کالے سائے ہیں ۔ ان کا کوئی دھرم اور مسلک نہیں ہے۔یہ باغی ہیں۔ یہ باغیانہ فکر صرف اسی قوم میں نہیں ہے بلکہ آج تقریبا ہر مذہب کے پیروکاروں میں یہ فکر تیزی سے پھیل رہی ہے۔یہ وہ فکر ہے جو پوری دنیا کے مذہب کے خلاف کھڑی ہے۔نفس، ہوس، دولت،طاقت،عیش وعشرت اور آزادی کے نشے میں چور یہ فکرپوری دنیامیں ایک مذہب مخالف فکر کو کھڑی کر رہی ہے۔ان سب کے دین اور اس کی فکر کا سب بڑا ذریعہ آج کی سوشل میڈیا ہے۔ آج اس ذرائع سے جڑاہوا ۸۰ فیصد انسان اس ذرائع سے نشر کی جانے والی خبروں کی تصدیق نہیں کرتا۔ یہاں سب کچھ موجود ہوتا ہے۔ دین بھی لوگ یہیں سیکھنے لگے ہیں اور اس سے بغاوت بھی۔اس جال میں آج کا نوجوان پوری طرح گھر چکا ہے۔ وہ ایک ریموٹ کنٹرول کے سہارے ہے۔مجھے اس کی باتیں بور کر رہی تھیں۔ لیکن دل اتنا اچاٹ اور طبیعت اتنی چور ہو چکی تھی کہ تاریک وحشت سے بچنے کیلئے بس کسی کا ساتھ درکار تھا اور وہ بولتا ہوا ساتھ ہو تو زیادہ سکون بخش ہوتا۔انہوں نے کہا یہی فکر پورے عرب کو کھارہی ہے۔پچھلے دس برسوں میں بیس لاکھ سے زیادہ بے گناہ انسان مارا جا چکا ہے۔یہی حال تمہارے ملک ہندوستان پاکستان اور افغانستان کا بھی ہے۔ ایک لمبی اکھڑتی اور کپکپاتی ہوئی سانس لیتے ہوئے انہوں نے کہا کہ ہم نے دیکھا ہے ان بدھسٹوں کو انسانی خدمات کی مثالیں قائم کرتے ہوئے۔انسان تو انسان کسی جانور کو بھی کوئی تکلیف پہنچ جائے تو چیخ اٹھتے تھے۔ لیکن آج وہ سب خاموش ہیں۔ ہو سکتا ہے مجبور ہوں جیسے ہم اس وقت خاموش اور مجبور تھے جب طالبان نے بدھسٹوں کے مذہبی مجسمے گرائے تھے۔ہم کچھ نہ کر سکے اور نہ ہو کچھ کہہ سکے۔پوری دنیا میں دہشت گرد مذہب کے نام پر دشہت گردی پھیلاتے رہے۔سارے مسلم ممالک خاموش رہے۔ ایک ایک کر کے جب وہ خود اس کا شکار ہونے لگے تو پڑوسی خاموش رہا۔ دعوت وتبلیغ کی ساری تنظیمیں خاموش رہیں۔یہاں بھی آئے تھے ہمیں دین سکھانے کے لئے۔ لیکن وہ تو ہمیں کچھ اور ہی سکھا گئے ۔ کچھ نوجوانوں کوبندوق دے گئے۔ آج پوری قوم مظلوم ہے۔مجھ سے رہا نہ گیا میں نے پوچھ لیا کہ آخر یہ سب ہے کیا؟ کس کی کیا دل چسپی ہے؟ عالمی برادری کیوں خاموش ہے؟ میرے ملک کے وزیر اعظم کا دورا بھی ہوا۔ یہ سب کچھ دیکھ کر وہ بھی خاموش رہے۔ ایسا کیا ہے؟ انہوں نے کہا کہ اب صحیح علم تو خدا ہی کو ہے البتہ اتنا تو طے ہے کہ اس برما سے سب کی اپنی اپنی سیاسی دلچسپیاں وابستہ ہیں۔یہاں تک کہ مارنے والوں کو بھی اب مذہبی جذبہ متاثر کئے ہوئے نہیں ہے بلکہ انہیں بھی سیاست استعمال کر رہی ہے۔انہوں نے بڑی گہری نظر میری آنکھوں میں ڈالتے ہوئے کہا کہ آپ کو خلافت عثمانیہ کے زوال کی تاریخ اور ہینفرے کے اقرار نامے کے متعلق کچھ معلومات ہے؟ میں نے غیر یقینی طورپر سر اوپر نیچے کر کے دائیں بائیں بھی ہلادیا۔ انہوں نے کہا کہ امریکہ ، نے یا یہودیوں نے بانٹو راج کرو کی سیاست کو سب سے پہلے مسلمانوں پر آزمایا۔ کافی محنت کے بعد وہ اس میں کامیاب ہوئے۔ اس کا ایک کامیاب تجربہ افغانستان میں طالبان بنا کر کر چکے ہیں۔ اب جہاں کہیں بھی امریکہ کو جانا ہوتا ہے۔ وہاں دہشت گردی کے حملے اور فرقہ وارانہ فسادات اس محبوب ترین ذریعہ ہے۔ اس کے لئے ماحول سازی میں دعوت و تبلیغ کا بڑھیا استعمال ہوتا ہے۔
اطمئنان سے بیٹھ کر وہ اپنی ہی روانی میں کھو گئے اور لگا کہ کوئی کہانی سنا رہے ہوں۔ انہوں نے کہا کہ کہیں سے کوئی خبر آئی کہ برما میں بھی تیل ملا ہے۔برما کی جگہ ایشیا میں بالکل ایسے ہی ہے جیسے عرب ممالک میں سیریا اور ترکی ہے۔ہر آدمی اپنی جگہ بنانا چاہتا ہے۔کیونکہ برما یعنی میانمار ASEANمتحدہ ممالک میں بڑی اہمیت کا حامل ہے۔ چین اس کا سب سے بڑا حامی اور پیشوا بھی ہے۔ ملیشیا اور تھائی لینڈ سمیت اس اتحاد میں شامل ممالک کی مجموعی آبادی میں بدھ مت کے ماننے والے اکثریت میں ہیں۔اسی بیچ چین کی طرف سے ایک پروجکٹ لانچ ہونے کی خبر بھی سامنے آئی کہ ان ممالک کو جوڑنے کیلئے وہ سمندر سے ایک راستہ بنائے گا۔ اب تو روس اور اسرائیل کے ساتھ امریکہ کی دلچسپی ہونا لازمی ہے۔اس مدعے پر گفتگو پھر کبھی۔
میں جھٹ سے پوچھا کہ یہ سب تو ٹھیک ہے ہمارے ملک ہندوستان کا اس کے کیا تعلق ہے۔ انہوں برجستہ کہا کہ جس ملک میں بھی مذہب کے خلاف باغیانہ فکر موجود ہے،ہر اس ملک کی دلچسپی ہے۔ انہوں نے کہاکہ میں نے سنا ہے کہ مسلمانوں کے ساتھ دلتوں کو بھی وہاں ظلم کا شکار کیا گیا ہے۔ بدھ مت کا آج کے نام نہاد ہندوتو سے بہت پرانا بیر اور دشمنی ہے۔یہ ملک ہند مخالف رہا ہے۔ اب ایسا بھی سننے میں آیا ہے کہ تم لوگ دلت مسلم اتحاد کی بھی باتیں کرنے لگے ہواور کچھ جگہوں پر اس کی طاقت کا مظاہرہ بھی کیا ہے۔یہاں کے دورے اور بدھسٹوں کو ہندوستان میں ملنے والی سہولتیں سب ایک دوسرے سے منسلک ہیں۔چونکہ ہندوستان خود ASEANکا حصہ نہیں ہے۔اس لئے اس نے SAARC بنایا۔اب اگر مسلمان پلٹ کر وار کرتے ہیں، تو دونوں میں کشیدگی پھیلتی ہے۔ تو اس کا سیاسی اثر سب سے پہلے تو یہی ہوگا کہ ان دونوں کے درمیان اتحاد کے امکانات فوری طورپر ختم ہو جائیں گے۔دسرا یہ کہ ہندی چینی بھائی بھائی کا ایک اور راستہ نکل آئے گا۔ انہوں نے ذرا لہجہ بدلتے ہوئے کہا کہ ویسے یوگی جی بھی یہاں آ چکے ہیں۔میں نے ایک گہری سانس لی۔ ابھی سانس پوری طرح چھوڑی بھی نہیں تھی کہ انہوں نے برجستہ کہا کہ اس طرح کے حادثات کے لئے تیار رہو۔ بلکہ اس سے بھی بدتر حالات کا سامنا کرنا ہوگا۔ ہم نے کہا کوئی حل؟ ہنسنے لگے۔ اچانک سنجیدہ ہو کر کہنے لگے حل تو ہے لیکن ذرا مشکل ہے۔ جب تک لوگ سوشل میڈیا سے دین سیکھ کر سوشل میڈیا پر ہی دین کی حفاظت کرتے رہیں گے، جب تک مذہبی نااہلوں کی قیادت تشدد اور انتہا پسندی کے فروغ کا حصہ بنتی رہے گی اور جب تک ہم اپنے پڑوسیوں کے ساتھ بیٹھے اور بین المذاہب گفتگو سے دور ہوتے رہیں گے، ایسی تباہیوں سے کوئی نہیں روک سکتا۔ابھی اس پر میں کسی رد عمل کا اظہار کر پاتا کہ ایک تیز شور قریب ہی سے سنائی دیا ایسا لگا بس سر پر کوئی وار کرنے والا ہے۔ میں نے بزرگ کی طرف دیکھا وہ مسکرا رہے تھے۔ دل کی تیز دھڑکنیں مجھے سنائی دے رہی تھیں۔دھیرے دھیرے ان بزرگ کا چہرہ آنھوں سے دھندلہ ہو رہا تھا لیکن ان کی کہی ہوئی ایک ایک بات کسی نشتر کی طرح چبھ رہی تھیں۔ ایسا لگا میں کسی گھنے اور تاریک جنگل میں پھنس گیا ہوں۔ چاروں طرف سے انجان اور غیر مرئی طاقتیں مجھے اندر سے ڈرا رہی تھیں۔ پسینہ سے پورا جسم طر ہو گیا تھا۔ایک عجیب سے بھنور میں قید ہو گیا۔ وہا ں سے نکلنے کی کوئی سبیل نکلتی نظر نہیں آرہی تھی۔ کسی مدد یا اس طرف سے گزرنے والے شخص کا بے صبری اور شدت سے انتظار کر رہا تھا۔ دوڑتے دوڑتے پر جواب دے گئے۔ ہر بار میں اپنے آپ کو اسی جگہ پاتا۔ تھک ہار کر غش کھاکر اسی درخت سے ٹکراکر اسی بزرگ کی گود میں گر گیا۔آنکھ کھلی تو دیکھا میری باہوں میں ان کا ہاتھ اور اس کی کمر ہے۔ جسم سے دونوں پیر الگ ہیں۔کرتا پورا سرخ ہے۔ آنکھیں بالکل دھنسی ہوئی ہیں۔ خون سوکھ کر کالا پڑ چکا تھا۔ مجھے یہ سمجھنے میں دیر نہ لگی کہ میں عالم بے ہوشی میں اس سے باتیں کر رہا تھا۔کیونکہ ان کا خون ہوئے تو کافی عرصہ ہوئے معلوم ہوتا ہے۔ ذرا سا سنبھالا لے کر گھر کی طرف بے تہاشا بھاگا۔ پوری قوت سے بھاگا۔ لیکن پانچ سو میٹر کا راستہ ختم ہونے کا نام نہیں لے رہا تھا۔ ایسا لگ رہا تھا کوئی راستہ طویل کر رہا ہے کہ مجھے پکڑے ہوئے ہے اور آگے بڑھنے نہیں دے رہا ہے۔میں زور زور سے چلانے لگا۔پانی کے چھینٹیں منہ پر پڑے تو چاروں طرف میرے دوست مجھے نیم کھلی آنکوں سے مجھے گھور رہے تھے۔ میرا پورا جسم تپ رہا تھا اور پسینے سے تر بتر تھا۔
آنکھیں کھلی تھیں لیکن ابھی بھی پوری طرح ہوش میں نہیں تھا۔مجھے ابھی بھی یاد آ رہا تھا کہ بزرگ کے ساتھ ہوئی گفتگو کے بعد میں آل انڈیا علماء و مشائخ بورڈ کے بانی و قومی صدر سید محمد اشرف کے کئی بیانوں کو کھنگال رہا تھا۔ جہاں انہوں نے کہا تھا کہ دوسروں کے گھر کی صفائی کی مہم سے پہلے اپنے گھر کی صفائی ضروری ہے۔ ہمارے مذہب کے نام پر بھی کچھ چند ایک سرپھرے اس مذہب مخالف فکر اور نظریے کا شکار ہو رہے ہیں۔جو فکر تبلیغ کے نام پر اٹھتی ہے اور ایک ظالم طاقت بن کر درگاہوں، خانقاہوں اور امام بارگاہوں تو توڑنے اور مسلمانوں ہی کو قتل کرنے لگتی ہے۔پوری دنیا میں دہشت و وحشت کا کاروبار کرتی ہے۔ جس کی وجہ سے اس کے مخالف ایک فضا قائم کی جاتی ہے۔ یہ فکر مذہبی تشدد پر آمادہ کرنے کے ساتھ رواداری ختم کرنے پر زور دیتے ہیں۔دھیرے دھیرے ایک طویل عرصے سے ایک دوسرے کے دکھ سکھ میں ساتھ رہنے والوں کے بیچ نفرت یا کم از کم بے زاری کی دیوار کھڑی ہو جاتی ہے۔میرے دوست مسلسل مجھے دیکھے جا رہے تھے۔ انہوں نے مجھے جنجھوڑا۔ میری آنکھیں پوری طرح سے کھل چکی تھیں۔ پورا جسم پسیے سے بھیگا ہوا تھا۔ سب کی سوالیہ نگاہیں میری طرف تھیں۔ میں نے کہا کہ بھائی ایک برا سپنا تھا۔ خدا کرے سچ نہ ہو۔
صبح کے اخبار میں روہنگیا سے جان بچا کر بھاگے مظلوم پناہ گزینوں کے متعلق حکومت وقت کا موقف دیکھ کر حیرانی تو نہیں ہوئی لیکن افسوس ضرور ہوا۔ یہ ہمارے گاندھی، آزاد، نیتا جی اور سردار کے خوابوں کا ملک تو نہیں ہے۔ ہمارے سوامی وویکا نند اور بابا بھیم راؤ کی فکر کے مخالف یہ بیان تھا کہ ان مظلوموں سء ملک کو خطرہ ہے۔انسان کے دل رکھنے والے انسان کے لئے یہ ایک بڑا چیلنج ہے۔ ملک کے ان مجاہدوں کے خوابوں کا ہندوستان بنائیں یا ملک کو اس ظالم فکر کے حوالے کر دیں۔
*****
Abdul Moid Azhari (Amethi) Email: abdulmoid07@gmail.com, Contact: 9582859385


@@---Save Water, Tree and Girl Child Save the World---@@

Saturday, August 26, 2017

کیا یہ میڈیا کی وطن پرستی پر سوال نہیں؟Is it not a question on Media?क्या यह मीडिया की देश भक्ति पर प्रश्न चिन्ह नहीं है?


کیا یہ میڈیا کی وطن پرستی پر سوال نہیں؟

عبد المعید ازہری

جس طرح سے میڈیا اپنے اخلاق کا گلا گھونٹ کر ملک کو اخلاقی طور پر کھوکھلا کر رہی ہے، وہ اس مصداق پر پوری طرح کھری اتر رہی ہے کہ’’ ہم تو ڈوبیں گے صنم تم کو بھی لے ڈوبیں گے‘‘۔میڈیا کا گرتا معیار آج گرتی سرکاروں سے زیادہ بکاؤ ہوتا جا رہا ہے۔ اکیسویں صدی کی آزادی اور خود مختاری کے طوفان نے میڈیا اور سیاست کے دل و دماغ کو ایک ساتھ معزور و معزول کر دیا ہے۔آج کا میڈیا دہشت اور نفرت پھیلانے کا ایک ذریعہ بن چکا ہے۔ ایک زمانے میں میڈیا کو جمہوریت کا ستون کا کہا جاتا ہے۔آج بھی ستون ہی ہے لیکن سب سے پہلے گرنے اور بکنے والاستون۔اس ملک کے لئے میڈیا کی بھی بڑی قربانیاں رہی ہیں لیکن آج کے غدار اور کاروباری میڈیا والوں نے ان قربان ہونے والوں کی روحوں کو پھر سے مارنے کا کام کیا ہے۔ حق گوئی اور بے باکی، سچ بولنے، دکھانے اور اسے ثابت کرنے کا سارا جذبہ چمچا گیری کی نذر ہو گیا۔ آج جب بھی اخبار اور ٹی وی دیکھو تو ڈر لگتا ہے۔ نہ جانے اب کس خبر سے دہشت پیدا کر دی جائے۔ ایک داعش اور اس کی ہم فکر تنظیمیں دہشت کا کاروبار کر رہی ہیں۔ دوسری ہمارے ملک کی مخصوص بھیڑ ڈر کا کاروبار کر ہی ہے۔ بیچ چوراہے پر کسی کو بھی مار کر اس کی ویڈیو بناکر اسے خود شیئر کر کے ملک کے آئین اس کے دستور اور اس کے جمہوری نظاموں کو چیلنج دے کر انصاف اور قانون کا خون کر رہے ہیں ۔ وہیں میڈیا بھی ان کا آلہ کار بن کر اس کاروبارکو فروغ دینے کا کام کر رہی ہے۔لوگوں کو اطراف اکناف کی ضروری تبدیلیوں سے آگاہ کرنے کی بجائے ان پر خوف طاری کر رہی ہے۔ اس کے بعد اس خوف کے ازالہ کے لئے کاروباری دروازے کھول دئے جاتے ہیں۔ڈر کا کوروبار ایسا ہے جس میں نقصان نہیں ہوتا ہے۔
میڈیا کے اس ڈوبتے سورج کی کبھی صبح امید اور جوش کی تپش اور جنون کی گرمی بھی ہوا کرتی تھی جس میں نہ جانے کتنی باطل اور مجرم طاقتوں کی کالی بدلیاں کسی نا معلوم کونوں میں دبک جاتی تھیں۔ انصاف کے جب سارے دروازے بند ہو جاتے تھے تو یہی ایک دروازہ تھا جس نے کبھی کسی کو خالی ہاتھ نہیں بھیجا۔ سیاسی رہنماؤں کی طرح اس شعبہ نے بڑی قربانیاں دی ہیں۔ جو تاریخ میں زندہ ہیں اور انہیں کی وجہ سے آج کی صحافت کی آبروزندہ ہے ورنہ آج کے کاروباری اور بکاؤ صحافیوں نے تو اس کا گلا تقریبا گھونٹ ہی دیاہے۔ایک سچا صحافی اپنے آپ میں ایک انصاف بلکہ ایک انقلاب ہوتا ہے۔ ملک کے ذمہ داروں میں اس کا شمارہوتا ہے۔ جس طرح ملک کا مستقبل سیاسی،سماجی اور قانونی رہنماء طے کرتے ہیں اسی طرح اس میں ایک حصہ میڈیا کا بھی ہوتا ہے لیکن آج بد عنوانی کی آندھی میں یہ ستون بھی گر چکا ہے۔
آج اخبار میں کیا آنا ہے اور ٹی وی میں کیا دکھایا جانا ہے یہ سب بند کمرے کی سیاست طے کرتی ہے۔قومی سطح پر کس کو کہاں کیا اور کیسا مقام دینا ہے یہ سب طے شدہ ہوتا ہے۔ایک سینئر صحافی کے ۵۰ سالہ صحافتی تجربہ کے مطابق ملک میں رونما ہونے والے بڑے حادثات جیسے دنگے، فرقہ وارانہ فسادات،سر عام کسی کا قتل یا پھر انکاؤنٹر یہ سب پہلے سے طے ہوتا ہے۔ان تمام چیزوں سے پرے میڈیا کا اپنا ایک اصول ہے کہ وہ اپنی خبروں سے معاشرے میں ڈر پیدا نہیں کر سکتی۔ اسے ہر حال میں لوگوں میں ہمت اور امیدبنائے رکھنا ہوتا ہے۔ آج کی میڈیا میں بالکل اس کے مخالف کام ہو رہا ہے۔کسی کو بھی مجرم یا دہشت گرد کہنا تو اس کا یومیہ مشق ہو گیا ہے۔ اس کا جرم ہے بھی کہ نہیں، عدالت اورقانون اسے کیا کہتا ہے ان سب چیزوں کی پرواہ کئے بغیر ہمارے صاحب کیاکہتے ہیں اس کی پرواہ کی جاتی ہے۔ہر روز اپنا نیا ساتھی یا پھر ساتھ کے لئے ہر روز بکنے والا معیار ہو گیا ہے۔ اس کا یہ معیار خود اس میڈیانے اپنے ہاتھوں سے تیار کیا ہے۔ آج کی میڈیا محض کاروبار ہے، اس کے سوا کچھ نہیں ہے۔ یہ میڈیا کاروبار اور پیسہ کے لئے کچھ بھی کر سکتی ہے۔ وہ جی حضوری کے چکر میں ملک کی عظمت اور اس کے وقار کو بھی خاک میں ملا سکتی ہے۔ ایسا ہی واقعہ حال ہی میں ہوا ہے۔
TRP، سنسنی اور سب سے پہلے خبر دینے کی ہوڑ نے سب کے ہوش اڑادئے جب یہ خبر میڈیامیں عام ہوئی کہ’’ ملک کے پاس ہتھیار کم ہیں‘‘۔جنگ کی صورت میں مشکل کا سامنا کرنا پڑ سکتا ہے۔مطلب ہم کمزور ہیں۔ بظاہر یہ بہت چھوٹی بات ہے۔ لیکن اس کے پیچھے کے سوالات نہایت ہی خطرناک ہیں۔ سب سے پہلا سوال کہ ’ہمارے ملک میں کتنا ہتھیار ہے‘ یہ خبر ایسے ہی میڈیا میں کیسے آگئی؟یہ خبر چھاپنے یا دکھانے سے پہلے میڈیا نے کیوں نہیں سوچا کہ اس کا کیا رد عمل یا پس منظر و پیش منظر ہو سکتا ہے۔اس خبر کا قومی اور بین الاقوامی سطح پر ملک پر کیااثر پڑے گا۔ اس خبر سے کس کو کتنا فائدہ اور کتنا نقصان ہو سکتا ہے؟یہ سب بڑے ہی ڈرامائی اور فلمی انداز میں ہوا۔ چین کی جانب سے ملک کے خلاف بڑھتے اقدامات کے جواب میں کئی ممالک کی حمایت کی خبریں آتی ہیں۔ چینی سامان کے بائکاٹ کا پروپیگینڈہ ہوتا ہے۔ ہند و چین کے روزانہ بگڑتے حالات کی خبریں بھی آئی ہیں۔اچانک خبر آئی ہے کہ ہمارے پاس تو ہتھیار ہی نہیں ہیں۔سرجیکل اسٹرائک سے لے کر اب تک جس طرح سے ہماری فوج کا سیاسی استعمال اور قدرے استحصال ہوا وہ شاید ملک کی تاریخ میں ایک نمایاں باب ہو۔اس خبر نے جہاں ملک کو ایک طرف کشمکش میں ڈال دیا ہے وہیں دوسری طرف ایک بڑے خدشے کا بھی اشارہ دیا ہے۔ اب جب ملک میں ہتھیار کم ہیں۔ اس پر پاکستان اور چین کی طرف سے مسلسل دست درازی کا سلسلہ بھی جاری ہے۔ اس لئے بھاری مقدارمیں اسلحہ اور ہتھیار کی خریداری ہونی ہے۔ کچھ دن قبل فوجی ٹرک کی خریداری اور اس سے جڑے کچھ خلاصے سامنے آئے تھے۔ اس خریداری میں جس قدر گھوٹالہ اور اسکیم کامعاملہ سامنے آیا تھا کیا یہ اس سے بھی بھیانک ہو سکتا ہے۔یہ پانچ گھنٹے کی فلم میں ہر آدھے گھنٹے ،بیس منٹ، اور ایک گھنٹے میں جو سسپینس اور ٹویسٹ آرہے ہیں، وہ برے مہلک ہوتے جا رہے ہیں۔ ابھی تو دو گھنٹے کی فلم باقی بھی ہے۔ اس پر مزید یہ ہے کہ اگلے پانچ گھنٹے کی اس فلم کی دوسری سیریز بھی تقریبا تیار نظر آتی ہے۔کیونکہ تقریبا سارے پروڈکشن ہاؤس بند پڑے ہیں کہیں کوئی شوٹنگ چل ہی نہیں رہی ہے اور جس طرح سے یہ مسالہ فلم چل رہی ہے ایسا لگتا ہے کئی ریکارڑ توڑ کر ہی دم لے گی۔
ملک کی داخلی صورت حال وہ بھی سیکیورٹی سے متعلق خبریں نشر کرنا اور وہ بھی اتنی غیر ذمہ دارانہ طورمیڈیا کے ساتھ ساتھ ملک کے ساتھ بھی کھلواڑ ہے۔ اس سلسلے میں یہ عقدہ کشائی ایک طرف کہ آخر یہ خبر میڈیا میں آئی کیسے۔ اس کا سرجکل، نوٹ بندی،کشمیر، امرناتھ، GST ،صدر جمہوریہ کا الیکشن یا بہارکی سرکار اور سی بی آئی کے چھاپوں سے تو ہو سکتا ہے کوئی لینا دینا نہ ہو لیکن آج سیاست کی گھٹی میں شامل بد عنوانی کو تو کافی بڑا راستہ مل گیا ہے۔اب دیکھنا یہ ہے کہ اس پر حکومتوں کا کیا رد عمل ہوتا ہے۔اس انتہا پسند بھیڑ کا کیا رد عمل ہوتا جو ملک میں کھانا، کپڑا، کاروبار، کہنا سننا اور بولنا طے کرتے ہیں۔ جو ملک کی وفاداری کا ٹیسٹ لیتے رہتے ہیں۔ اب وہ اس بات کو کس طرح سے دیکھتے ہیں۔احتجاجی پیشہ وروں کا اس پر کیا رد عمل ہوتا ہے۔ یہ ایک قابل غور امر ہے۔سوشل میڈیا کے کرانتی کاری بھی اب تک خاموش ہیں۔ یا تو انہیں اب تک بتایا نہیں گیا یا رموٹ آن نہیں کیا گیا۔اب ایسی صورت حال میں اس قدر خاموشی ذہنی و اخلاقی طورپر موت کے ساتھ ساتھ وطن پرستی کی امید کے دم مرگ کو بھی ظاہر کرتی ہے۔
یہ بھی میڈیا کی سفاکیت ہے کہ سیمانچل کے سیلاب زدگان، گورکھپور کے معصوم بچوں کی اموات، دو ٹرینوں کے حادثے اور کرنل پروہت کی ضمانت کو دباکر سپریم کورٹ کے تین طلاق کے فیصلے اور وطن پرستی کے تئین بھارت ماتا کی جئے اور وندے ماترم پر سارا زور لگا رہی ہے۔ اس میڈیا کے لئے سب سے زیادہ اہم یہ ہے کہ وہ کسی طرح سے یوپی حکومت کی چمچہ گیری کو ثابت کرنے کیلئے یہ ثابت کر دیں یوپی کی تاریخ میں یہ پہلی بار ہوا ہے کہ یوگی سرکار کے فرمان کی وجہ سے مسلمانوں نے اپنے مدرسوں میں ترنگا پھہرایا اب ناگپور میں کیا ہوا اس کی کوئی جانکاری نہیں ہے۔ مودی حکومت نے مسلم عورتوں کے حق کے لئے ملک کو لاکھوں نوجوانوں کے روزگار، کسانوں کی خودکشیوں اور عورتوں کی آبروریزی کے سنجیدہ معاملا ت کو بالائے طاق رکھ دیا۔ یہ سب بس چند ٹکڑوں کے لئے ہوا۔
یہ خالص ملک، اس کی حفاظت، اس کے وقار اور داخلی پالیسی کا مسئلہ ہے۔لیکن وطن پرستی کی یہ خاموشی واقعی حیران کرنے والی ہے۔
جس طرح سے محض افواہ میں بے گناہوں کا قتل کر کے ملک کی حفاظت کا دعوی کرنے والی دہشت پسند بھیڑ نے ملک کے وقار کے تئیں اپنے خون کی قربانی دینے کے دعوے کئے ہیں کیا وہ لوگ اب اس میڈیا اور اس خبر کے نشر کرنے والوں کے ذمہ داروں سے اس متعلق سوال کریں گے۔ حکومت خاموش ہے۔ قانون چپ ہے۔ وفاداری کے سارے دعوے دار بے زبان ہیں۔کھلے عام ملک کے وقار کی توہین کی گئی ۔ذمہ دار کون ہے، محاسب کون ہے اور حساب کون دے گا؟
*****
Abdul Moid Azhari (Amethi) Contact: 9582859385, Email: abdulmoid07@gmail.com
follow me:


@@---Save Water, Tree and Girl Child Save the World---@@